(वाराणसी) आचार्य गुरुदेव श्री विद्यासागरजी महामुनिराज की परम पावन 172 शिष्याओं में सर्वप्रथम 11 माताओं की दीक्षा सन्1987 में मध्यप्रदेश के नैनागिर सिद्धक्षेत्र में पंचकल्याणक महामहोत्सव के अवसर पर हुई थी उसमें से चार आर्यिकाऐं प्रथम दीक्षित आर्यिका गुरुमतिमाताजी, ।दृणमति माताजी, गुणमतिमाताजी तथा पावन मति माताजी उपस्थित थी
इस अवसर पर निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर महाराज ने आर्यिका दीक्षादिवस पर सम्वोधित करते हुये कहा कि जो आर्यिकासंघ यंहा विराजमान है, वह बहूत ही अनुभवशील आर्यिकासंघ है यह हमारा तुम्हारा संघ नहीं है,यह हमारे गुरुवर की धरोहर है,आचार्य श्री की संपदा है,मुनि श्री ने कहा कि नैनागिर भगवान श्री पारसनाथ की समवसरण स्थली मानी जाती है मुनि ने कहाकि सम्मेदशिखर से बंदना करते हुये मुनिसंघ एवं आर्यिकासंघ पंचतीर्थों की वंदना करते हुये भगवान पारसनाथ की इस पावन नगरी में संघ का आना हुआ मुनि श्री ने कहा कि यह आप लोगों जैसा वर्थ डे नहीं है कि इसे उत्सव के रूप में मनाये यह संयमीओं का उत्सव है इस अवसर पर मुनि पवित्र सागर महाराज, मुनि बासूपूज्यसागर महाराज, मुनि श्री अतुल सागर महाराज ने सम्वोधित करते हुये दीक्षा के महत्व कोसमझाते हुये आत्मदृष्टि की ओर इंगित किया
इस अवसर पर आर्यिका रत्न गुरुमतिमाताजी ने नारी शक्ती के उत्थान की बात करते हुये कहा कि हमें तो हमारे आर्यिका जन्म नैनागिर से ही भगवान पारसनाथ मिले और आज हम श्री सम्मेद शिखर तीर्थ की बंदना के पश्चात बनारस नगरी जो कि चार तीर्थंकर की पावन नगरी है उसमें आना हुआ उन्होंने भगवान पारसनाथ के उपसर्ग की कथा सुनाते हुये कहा कि जब मान पर कुठाराघात होता है तो क्रोध आता है।आचार्य गुरुदेव श्री विद्यासागरजी महामुनिराज ने आज ही के दिवस 11आर्यिकाओं को अपना आशीर्वाद देकर महावृतों के साथ 28 मूल गुणों के साथ दीक्षा देकर आर्यिका पद प्रदान किया था चालीस वर्ष बीत गये और कैसे निकल गये पता नहीं लगा,इस अवसर पर ज्येष्ठ श्रैष्ठ आर्यिकारत्न गुरूमति माताजी ने उपवास के साथ 12 घंटे ध्यान में रहने के उपरांत सभा में पधारी उन्होंने कहा कि आर्यिका रत्न दृणमतिमाताजी ने कहा कि आचार्य श्री अर्थात आचार्य श्री विद्यासागर नाम को सार्थक किया है
आर्यिका श्रैष्ठ ने कहा कि गुरु का नाम ही काफी है।आज के दिवस हमारे आचार्य गुरुदेव ने नारी शक्ती की बात करते हुये कहा कि जैसे शरीर में नाड़ी का महत्व है उसी प्रकार समाज में नारी का महत्व है, उन्होंने चतुर्विद संघ के नायक बनकर इस युग के आदि में आदिम तीर्थंकर आदिनाथ भगवान ने जैसे ब्राह्मी सुंदरी को दीक्षित किया उसी प्रकार उन्होंने हम सभी आर्यिकाओं को गणनी के रुप में प्रशीक्षित किया उन्होंने मूकमाटी महाकाव्य की बात करते हुये कहा कि आचार्य गुरुदेव ने हम सभी को ब्राह्मी सुंदरी की परंपरा के रुप में हम सभी को अभिनव आचार्य श्री एवं मुनिसंध आशीर्वाद प्रदान करें। इसी क्रम में गुणमतिमाताजी ने कहा कि गुरुदेव ने हमें महावृतों को दिया उन्होंने जिनमति माताजी का नाम लेते हुये याद किया
कि उन्होंने सहेली होते हुये आगे बड़ाया आचार्य गुरुदेव ने हम लोगों को इतना ऊंचा बड़ाया कि हम सोच ही नहीं सकते थे और आज 40.वर्ष दीक्षा के निकल गये। राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन एवं जैन समाज के प्रचार मंत्री किशोर जैन ने बताया आज ही के दिन आर्यिका दीक्षा के साथ ऐलक निश्चयसागर महाराज की भी क्षुल्लक दीक्षा हुई थी उन्होंने भी सम्वोधित किया।इस अवसर पर सकल दि. जैन समाज वाराणसी उपस्थित थी इस अवसर पर समाज के अध्यक्ष आर.सी जैन,एवं महिलामंडल की अध्यक्षा ने भी सम्वोधित किया इस अवसर पर कमेटी के सभी पदाधिकारी उपस्थित थे।











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