डीडीयू नगर मुगलसराय चंदौली …..
मुगलसराय सावन महिने का महत्व आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से हमारे देश में अत्यधिक है। हरिशयनी एकादशी के पश्चात चतुर्मास प्रारंभ हो जाता है और भिन्न-भिन्न रूपों व उदबोधनो से महादेव की अर्चना पूरे देश में भक्तो द्वारा भक्ति-भाव से की जाती है।
देश के विभिन्न क्षेत्रों में जैसे कैलाश मानसरोवर , अमरनाथ , केदारनाथ , बद्रीनाथ , देवघर , गुप्ता धाम , ताड़क नाथ , काशी विश्वनाथ आदि जगहों के लिए कावड़ यात्राएं निकाली जाती हैं। देश में शासन-प्रशासन की निगरानी में यात्राओं को सुरक्षित निकालने की योजनाएं बनाई जाती हैं। वहीं सभी प्रदेश के निवासी अपनी-अपनी भाषा में बाबा भोलेनाथ को रिझाने के लिए गीतों का लेखन कर भक्ति-भाव से प्रस्तुती करते हैं।
श्रावण मास नजदीक आते ही विश्व की सबसे प्राचीन बनारस काशी नगरी के निवासियों में अपने आराध्य भोले बाबा को मनाने व रिझाने के लिए गीत स्वतः ही प्रफुल्लित होने लगते है।जगह-जगह स्टेज शो कार्यक्रम होते रहते थे। जगह-जगह कानों में रिकॉर्डिंग कजरी गीत सुनाई देते रहते थे।
लेकिन अब ऐसा नहीं हो रहा है। अपने पिता स्व हरिहर प्रसाद केसरी जी के संरक्षण में संगीत घराने में जन्मे बचपन से ही गीत संगीत के बारीकियों की तालीम हासिल करते हुए प्रयाग संगीत समिति इलाहाबाद से ( सन 2003 ) में सुगम संगीत गायन में प्रभाकर डिप्लोमा टीचर की उपाधि प्राप्त किए।
नगर में स्थापित सुप्रसिद्ध देवी पचरा गीत भजन गायक एवं केसरवानी वैश्य समाज के चन्दौली जिलाध्यक्ष अशोक सिद्धार्थ केसरवानी बताते है कि श्रावण मास में बनारस काशी व उससे लगायत आसपास पूरे पूर्वांचल के क्षेत्रों में लोकगीत लोकविधा कजरी कजली गायन का प्रचलन अधिक है
भूत भावन भगवान महादेव पर आसक्ति रखने वाला प्रत्येक व्यक्ति इन दिनों कजरी कजली गाने व उसका रस स्वादन करने के लिए रसिकों की भांति लालायित रहता है। पूर्वांचल की धरती पर चारों तरफ कजरी कजली गीत की आवाज सुनाई देने लगती थी। लेकिन अब धीरे-धीरे पाश्चात्य संस्कृति की ओर लोगों का रुझान बढ़ने से पारंपरिक धरोहर लोकगीत लोकविधा की सभी विधाएं लगभग विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी है।
इसका मुख्य कारण है कि युवाओं का पाश्चात्य गीतों व धुनों पर रुझान अधिक होना।* जिससे लोकविधा लोकगीतों को गाने व सीखने वालों गायक कलाकारों की संख्या दिन प्रतिदिन कम होते चली जा रही है।
पूछने पर गायक अशोक सिद्धार्थ केसरवानी ने बताया कि हमे सुगम संगीत भजन के अलावा हमारे यहां के फोक लोकगीत लोकविधा के अंतर्गत पारम्परिक गीत निर्गुण इत्यादि प्रकार के गीत गाने का शौक रखते है। सावन आते ही पूर्वांचल की धरती पर चारों तरफ गांवों में पेड़ों की डाल पर झूला डालकर झूलते झुलाते हुए महिलाओं द्वारा कजरी कजली गाने का प्रचलन सदियों पुराना है।
जो अब बहुत कम कही कही देखने व सुनने को मिलता है। कुछ गिने-चुने पुराने और कुछ नवोदित गायक कलाकार हैं जो इस धरोहर को जीवंत करने की जुगत में मनोयोग से लगे हुए हैं। भजन से संबंधित स्टेज शो कार्यक्रम कहीं ना कहीं बराबर होता रहता है। लेकिन कजरी गीत का स्टेज शो कार्यक्रम अब बहुत कम जगहों पर लोग कराते है।










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