पूरा देश जानता है कि भारतीय संविधान की रचना करने में डॉ. भीमराव अंबेडकर का योगदान सबसे अहम रहा। उन्होंने देश के संविधान के लिए जो अथक प्रयास किया उसके लिए हर कोई उनको सम्मान की नजर से देखता है, लेकिन कम ही लोग जानते होंगे कि उनकी शिक्षा कैसे हुई और उनका प्रारम्भिक जीवन कैसा रहा। आज हम आपको डॉ. भीमराव अंबेडकर की जिंदगी से जुड़े वो अनछुए पहलू बताएंगे जिनसे आप अंजान हैं।
जो दलित नेता डॉ. अंबेडकर को अपना आदर्श बताकर राजनीति करते हैं। वो उनकी जिंदगी को गलत तरीके से लोगों के सामने पेश करते हैं ताकि वो राजनीतिक मुनाफा कमा सकें। दलित नेता वोट बैंक के लिए हमेशा से लोगों को डॉ. अंबेडकर के जीवन से जुड़ी गलत जानकारियां देकर भ्रमित करते रहे। डॉ. अंबेडकर की सफलता और पढ़ाई के पीछे एक ऐसी सच्चाई है जो वोट बैंक की खातिर दलित नेताओं ने छुपा रखी है।
दलित नेता डॉ. अंबेडकर ने कैसे तालीम हासिल की और तालीम के लिए किसने उनकी मदद की वो कभी नहीं बताते। वो तो खुद को मजलूमों का सहारा बताकर डॉ. अंबेडकर के जीवन को गलत तरीके से पेश करते रहे हैं। जानकारी के मुताबिक बड़ोदरा रियासत के महाराज सयाजी गायकवाड़ को एक चिठ्ठी मिली जिसमे लिखा था की मैं एक दलित हूं और आगे की पढाई के लिए लंदन और अमेरिका जाना चाहता हूं लेकिन मेरी आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं है कि मैं अपने बल-बूते विदेशो में पढ़ने जा सकूं।
डॉ. अंबेडकर ने ये चिट्ठी तब लिखी थी जब डॉक्टर अंबेडकर अपनी शिक्ष के लिए धन जुटाना चाहते थे। उन्होंने चिट्ठी में लिखा था कि कमजोर माली हालत के चलते कोई भी मेरी मदद करने को तैयार नहीं है। ये चिठ्ठी कोई और नहीं स्वयं आंबेडकर ने महाराजा सयाजी गायकवाड़ के लिए लिखी थी। उस चिठ्ठी के साथ अंबेडकर ने अपनी मार्क शीट भी भेजी थी ताकि उनकी काबिलियत को महाराजा समझ पाएं।
डॉ. अंबेडकर की मार्क शीट को देखकर सयाजी महाराज काफी प्रभावित हुए और अम्बेडकर को मिलने के लिए बुलाया और उनसे कहा तुम विदेश में पढ़ाई करने जाओ हम हर संभव तुम्हारी मदद करेंगे। महाराजा ने कहा कि किसी बात की चिंता मत करना बस मन लगा के पढ़ाई करना। महाराज ने अम्बेडकर की पढ़ाई के सारे खर्चे उठाये और उनके विदेश में रहने का भी प्रबंध किया।
डॉ. भीमराव अंबेडक की समस्याएं सिर्फ पढ़ाई खत्म करने के बाद खत्म नहीं हो गई थीं। उनकी समस्या तब और बढ़ गई जब उनको कोई पीएचडी करने के बाद नौकरी नहीं देना चाहता था। ऐसे में एक बार फिर महाराज सयाजी ने डॉ. अंबेडकर की मदद की उन्हें नौकरी देते हुए अपनी रियासत में महामंत्री के पद पर नियुक्त किया। उस जमाने में अंबेडकर को 10,000 रुपए मिलते थे। जो कि उस जमाने में 1 करोड़ के बराबर होता था।
जिन संविधान निर्माता डॉ. अंबेडकर को दलित नेता वोट बैंक के लिए इस्तेमाल करते हैं। वो कभी महाराजा सयाजी गायकवाड़ का नाम नहीं लेते और न उनकी मदद की बात किसी को बताते हैं। दलित नेता आवाम का समर्थन हासिल करने के लिए डॉ. अंबेडकर को दवा कुचला बताकर अपनी राजनीति को चमकाने का काम करते हैं।








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