वाराणसी।
संगीत एवं मंच कला संकाय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में आयोजित तीन दिवसीय सांस्कृतिक कार्यक्रम के अंतर्गत प्रथम दिवस का आयोजन दिनांक 23 मार्च 2026 को पंडित ओंकारनाथ ठाकुर को समर्पित करते हुए गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ प्रातः 11:00 बजे उद्घाटन सत्र के साथ हुआ, जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में पद्मश्री प्रो. ऋत्विक सान्याल की गरिमामयी उपस्थिति रही।
कार्यक्रम का संचालन सौरभ चक्रवर्ती एवं डॉ. श्यामा कुमारी द्वारा किया गया। उद्घाटन सत्र में दीप प्रज्ज्वलन के उपरांत चंद्रधर त्रिपाठी द्वारा मंगलाचरण प्रस्तुत किया गया। इसके पश्चात डॉ. मधुमिता भट्टाचार्य के निर्देशन में विद्यार्थियों द्वारा कुलगीत की प्रस्तुति दी गई। स्वागत भाषण प्रो. संगीता सिंह द्वारा प्रस्तुत किया गया तथा अतिथियों का सम्मान भी संपन्न हुआ।
कार्यक्रम का यह दिवस पूर्णतः पंडित ओंकारनाथ ठाकुर जी के विराट व्यक्तित्व एवं उनके संगीतिक योगदान को समर्पित रहा। इस अवसर पर डॉ. श्यामा कुमारी ने उनके जीवन, कृतित्व एवं संगीत साधना पर विस्तार से प्रकाश डाला।

सांस्कृतिक कार्यक्रमों की श्रृंखला में डॉ. रेवती साकलकर द्वारा “रामचंद्र कृपालु भजमन” की भावपूर्ण प्रार्थना प्रस्तुत की गई। तत्पश्चात प्रो. संगीता सिंह के निर्देशन में विद्यार्थियों द्वारा गुरु वंदना “खोल हृदय का द्वार हमारे गुरुवर आन विराजो” प्रस्तुत की गई।
वाद्य एवं गायन प्रस्तुतियों के अंतर्गत डॉ. अंजली द्वारा सितार वादन में राग भीमपलासी की प्रस्तुति दी गई। आनंद मिश्रा ने तबला वादन में विभिन्न लयों, गतों एवं रचनाओं का प्रभावशाली प्रदर्शन किया, जिसमें डॉ. अमृत मिश्रा द्वारा नगमा संगति की गई।
डॉ. शुभंकर डे द्वारा शास्त्रीय गायन में राग पटदीप प्रस्तुत किया गया, जिसमें तबला पर सिद्धांत मिश्रा तथा हारमोनियम पर डॉ. इंद्रदेव चौधरी ने संगति प्रदान की। तानपुरा पर हर्ष एवं अभय द्वारा सहयोग दिया गया। इसके अतिरिक्त डॉ. रजनीश तिवारी द्वारा एकल तबला वादन की प्रस्तुति भी दी गई।
कार्यक्रम के अंतर्गत नृत्य विभाग के विद्यार्थियों द्वारा भरतनाट्यम की आकर्षक प्रस्तुति दी गई, जिसका निर्देशन डॉ. खिलेश्वरी पटेल द्वारा किया गया। इस प्रस्तुति में नेहा कुमारी, रतन कुमार, रुनु भट्टाचार्जी, श्रेया गुप्ता, राजश्री, आरती कंडुलाना एवं जे. यशोमिता ने सहभागिता की। प्रस्तुति में कृष्ण की भूमिका हेतु मेकअप कलाकार इसुरु रुशन कपुडुवा का विशेष योगदान रहा।
सम्पूर्ण आयोजन में भारतीय संगीत की आध्यात्मिकता, गुरु-परंपरा एवं सांस्कृतिक समृद्धि का उत्कृष्ट समन्वय परिलक्षित हुआ। कार्यक्रम में संकाय के शिक्षकगण, शोधार्थी, विद्यार्थी एवं संगीत प्रेमी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।











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