वाराणसी, 5 जुलाई:
सदर इमामबारगाह, सरियां (बनारस) में मशहूर “72 ताबूत” (बहत्तर ताबूत) की मजलिस-ए-अज़ा और जुलूस का पुरवक़ार आयोजन हुआ, जो इस साल अपने 12वें दौर में दाख़िल हुआ। दिन में जैसे ही 72 ताबूत उठाए गए, पूरा इमामबारगाह “या हुसैन” की सदाओं से गूँज उठा और अज़ादारों ने पुरनम आँखों से कर्बला के शहीदों को खिराजे-अक़ीदत पेश किया। हज़रत अली समिति के सदस्य सलमान हैदर ने बताया कि ये 72 ताबूत कर्बला में इमाम हुसैन के साथ शहीद हुए 72 जाँनिसारों की याद और उनके ग़म की अलामत हैं।
मजलिस को हुसैनी का ख़िताब, तिलावत से हुआ आग़ाज़:
मजलिस का आग़ाज़ जनाब आबिद अब्बास साहब की तिलावते-कलामे-पाक से हुआ। इसके बाद ख़तीब-ए-हुसैनियत हुज्जतुल इस्लाम मौलाना सैयद मोहम्मद हुसैनी (मुज़फ़्फ़रनगर) ने मजलिस को ख़िताब करते हुए इमाम हुसैन और शहीदाने-कर्बला की अज़ीम क़ुर्बानी को बयान किया और हक़ व बातिल के इस मारके की अहमियत पर रौशनी डाली, जिसे सुनकर पूरी मजलिस अश्कबार हो गई।
ज़ीशान आज़मी ने बयान किए एक-एक शहीद के ताबूत:
मजलिस की निज़ामत डॉ. शफ़ीक़ हैदर साहब ने की, जबकि निक़ाबत करते हुए जनाब ज़ीशान आज़मी साहब ने कर्बला के 72 शहीदों का पुरदर्द तआरुफ़ पेश किया और एक-एक करके हर शहीद के ताबूत के बारे में बताया। उन्होंने बताया कि किस तरह इमाम हुसैन ने अपने जिगर के टुकड़ों और वफ़ादार साथियों को हक़ की राह में क़ुर्बान किया—
6 महीने के अली असग़र, 18 साल के अली अकबर, 13 साल के क़ासिम, अलमदार हज़रत अब्बास और औन व मोहम्मद समेत तमाम जाँनिसार शहीदों के ताबूत का ज़िक्र सुनकर हर आँख से आँसू जारी हो गए और पूरे इमामबारगाह में कोहराम मच गया।
सोज़, मर्सिया व नौहा-ओ-मातम:
इस मौक़े पर कावश बनारसी, अरम बनारसी, क़ौसैन सुल्तानपुरी, सलीम बिलग्रामी और अली मूसा ने पुरदर्द कलाम पेश किए, जबकि सोज़-ख़्वानी जनाब लियाक़त अली ख़ान (छपरा) ने की। नौहा-ख़्वानी अंजुमन जवादिया (पितरकुण्ड) की जानिब से की गई, जिस पर अज़ादारों ने ज़ोरदार नौहा-ओ-मातम कर बारगाहे हुसैनी में अपनी अक़ीदत का इज़हार किया।
आयोजन:
यह आयोजन अंजुमन आबिदिया (चौहट्टा लाल खान, बनारस) के ज़ेरे-एहतिमाम और अंजुमन-हा-ए-मातमी बनारस की जानिब से अंजाम पाया। बड़ी तादाद में अज़ादाराने-हुसैनी और मोमिनीन ने इस मजलिस व जुलूस में शिरकत कर इमाम हुसैन और कर्बला के शहीदों को पुरसा पेश किया। सलमान हैदर ने तमाम शरीक होने वाले अज़ादारों का शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि हर साल की तरह इस बार भी “72 ताबूत” का यह आयोजन अक़ीदत और ग़म के माहौल में मुकम्मल हुआ।











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