भारतीय न्यायपालिका में जजों की भूमिका और बोलने की सीमा को लेकर बहस: क्या जजों को भाषण देना चाहिए?”

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क्या आपको लगता है कि अदालतों में जजों को सुनवाई के दौरान भाषण या लेक्चर देना चाहिए?

हाल ही में पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज मार्कंडेय काटजू ने कहा कि “जजों को सुनवाई के समय भाषण या ज्ञान नहीं देना चाहिए, बल्कि कानून के मुताबिक ही फैसला करना चाहिए।” ये बयान सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुआ। फैक्ट चेक करने पर पता चला कि यह कथन पूरी तरह सही है।

काटजू ने अपने ब्लॉग और इंटरव्यू में कई बार कहा है कि भारतीय अदालतों में जज ज़रूरत से ज़्यादा बोलते हैं और असल मुद्दे से भटक जाते हैं। उनका कहना है कि न्यायालय का काम सिर्फ न्याय करना है, न कि प्रवचन देना। उनका मानना है कि अदालत कोई क्लासरूम नहीं, जहाँ ज्ञान बांटा जाए, बल्कि कानून के दायरे में न्याय हो।

आपका क्या मानना है — जजों को बोलने पर नियंत्रण रखना चाहिए या जनता को जजों का दृष्टिकोण सुनना जरूरी है?

इससे लगता है कि भारतीय न्यायपालिका समय के दौर में में उच्चस्तरीय न्यायपालिका में न्यायधीशों की उचित चयन प्रणाली के अभाव में दिशाहीन हो गई है क्योंकि फालतू की बकवास करने के मामले में काटजू साहब का भी अपने समय में कोई जोड़ नहीं था ।

 

रिपोर्ट – जगदीश शुक्ला

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