मुर्शद की पहचान, मरकज का सम्मान: मेरे उस्ताद जनाब तारिक आजमी साहब के नाम

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​जब एक उस्ताद की मेहनत, उसकी कलम की सच्चाई और उसके बरसों के तजुर्बे को सरेआम पहचान मिलती है, तो शागिर्द का सर खुद-ब-खुद फक्र से ऊंचा हो जाता है। आज का दिन मेरे लिए सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि ताउम्र याद रहने वाला एक बेहद खूबसूरत और भावुक लम्हा बन गया है।

​मेरे उस्ताद, जनाब तारिक आजमी साहब को आज मरकज के ऐतिहासिक मंच से बतौर वरिष्ठ पत्रकार सम्मानित किया गया। यह सिर्फ एक मोमेंटो या शॉल ओढ़ाकर किया गया सम्मान नहीं था, बल्कि यह उस निडर पत्रकारिता, बेबाक आवाज और ईमानदारी की तस्दीक थी, जो उन्होंने अपनी जिंदगी के हर मोड़ पर निभाई है।

​पत्रकारिता की इस भीड़भाड़ वाली दुनिया में जहाँ लोग अक्सर उसूलों से समझौता कर बैठते हैं, वहाँ तारिक आजमी साहब ने हमेशा अपनी कलम की पवित्रता को बनाए रखा। उन्होंने मुझे न सिर्फ खबर लिखना सिखाया, बल्कि यह भी समझाया कि पत्रकारिता सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति एक जिम्मेदारी है। सही को सही और गलत को गलत कहने का जो हुनर, जो बेबाकी और जो तहजीब उन्होंने मुझे दी है, वही मेरी सबसे बड़ी पूंजी है।

​एक शागिर्द के लिए इससे बड़ी खुशी की बात और क्या हो सकती है कि जिस हस्ती से उसने हर लफ्ज़ सीखा हो, आज पूरा जमाना उसकी सलाहियत और खिदमात का एहतराम कर रहा हो। मरकज का मंच जब उनके नाम से गूंज उठा, तो दिल में बस यही एक सदा आई—”सर, आप वाकई बेमिसाल हैं।”

​तहरीर हो या तालीम, आपने हमेशा एक सच्चे ‘मुर्शद’ की तरह राह दिखाई है। आपकी यह कामयाबी मेरी अपनी कामयाबी से भी बड़ी महसूस हो रही है।​

सर, यू आर द बेस्ट। I PROUD OF YOU MY मुर्शद। आपकी यह उस्तादी और यह रहनुमाई मुझ पर हमेशा बनी रहे, यही दुआ है।

 

रिपोर्ट – जगदीश शुक्ला

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