जौनपुर
सरकारी अस्पतालों में गरीब और जरूरतमंद मरीजों के लिए आने वाली दवाएं सिर्फ कार्टून में बंद सामान नहीं होतीं, बल्कि किसी मरीज के लिए वह इलाज की उम्मीद और जिंदगी बचाने का सहारा होती हैं। ऐसे में यदि किसी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के परिसर में दवाओं के रैपर और कार्टून जलते दिखाई दें, तो सवाल सिर्फ आग का नहीं, बल्कि जवाबदेही का बन जाता है।
जफराबाद क्षेत्र के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र नेहरूनगर, सिरकोनी परिसर का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया है। वायरल वीडियो में बाउंड्रीवाल के पास कार्टून और दवा से संबंधित रैपर जैसी सामग्री जलती दिखाई दे रही है। वीडियो सामने आते ही मामला अधिकारियों तक पहुंचा और जिलाधिकारी ने मुख्य चिकित्सा अधिकारी को पूरे प्रकरण की जांच कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।
वीडियो ने खड़ा किया सबसे बड़ा सवाल आखिर जल क्या रहा था।
मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है। कि यदि परिसर में केवल अनुपयोगी कागज या सामान्य कबाड़ जलाया जा रहा था, तो वहां दवाओं के रैपर और कार्टून कैसे पहुंचे।
और यदि जलाया गया सामान वास्तव में दवाओं अथवा दवा से संबंधित सामग्री थी, तो उसे नष्ट करने की प्रक्रिया क्या था।
किसके निर्देश पर सामग्री जलाई गई
क्या उसका कोई रिकॉर्ड तैयार हुआ।
क्या स्टॉक रजिस्टर में उसका उल्लेख है।
और क्या निर्धारित नियमों के तहत उसका निस्तारण किया गया।
इन सवालों का जवाब जांच से ही सामने आएगा।
डीएम के निर्देश के बाद स्वास्थ्य विभाग सक्रिय
वीडियो वायरल होने के बाद जिलाधिकारी के संज्ञान में मामला पहुंचा। उन्होंने मुख्य चिकित्सा अधिकारी को जांच कराकर रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी गंगाराम ने मामले को गंभीरता से लेते हुए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र नेहरूनगर के प्रभारी चिकित्सा अधिकारी राजीव कुमार से स्पष्टीकरण मांगा है। और पूरे प्रकरण की जांच कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के निर्देश दिए हैं।
प्रभारी चिकित्सा अधिकारी के अनुसार जांच के दौरान परिसर में कुछ जले हुए कार्टून और दवाओं के रैपर मिले। अस्पताल में उपलब्ध दवाओं के स्टॉक का मिलान कराया गया और उनके अनुसार स्टॉक सही पाया गया है।
लेकिन यहीं से कहानी खत्म नहीं होती।
स्टॉक सही है। तो जले हुए रैपर और कार्टून किसके हैं।
यही वह सवाल है। जिसका जवाब जनता जानना चाहती है।
यदि अस्पताल का दवा स्टॉक सही पाया गया है। तो वायरल वीडियो में दिखाई दे रही सामग्री की वास्तविक पहचान क्या है। क्या वह एक्सपायरी या अनुपयोगी सामग्री थी। यदि हां, तो उसका निस्तारण किस प्रक्रिया के तहत किया गया। क्या इसके लिए कोई रिकॉर्ड, अनुमति या अधिकृत प्रक्रिया मौजूद थी।
जांच को सिर्फ स्टॉक मिलान तक सीमित रखने के बजाय इन सभी सवालों की तह तक जाना जरूरी है।
क्योंकि सरकारी अस्पताल की दवा किसी अधिकारी की निजी संपत्ति नहीं होती। वह जनता के टैक्स के पैसे से खरीदी जाती है। और उसका एक-एक पैकेट सार्वजनिक धन से जुड़ा होता है।
वायरल वीडियो ने बढ़ाई पारदर्शिता की उम्मीद
यह मामला किसी व्यक्ति विशेष को दोषी ठहराने का नहीं, बल्कि व्यवस्था में पारदर्शिता सुनिश्चित करने का है।
यदि जांच में सामने आता है। कि केवल अनुपयोगी पैकेजिंग या कबाड़ जलाया गया था और प्रक्रिया नियमों के अनुरूप थी, तो तस्वीर साफ हो जाएगी।
लेकिन यदि दवाओं या दवा से संबंधित सामग्री को नियमों की अनदेखी कर जलाए जाने की पुष्टि होती है। तो फिर यह सवाल उठना स्वाभाविक है। कि जिम्मेदारी किसकी तय होगी।
जनता को जांच रिपोर्ट का इंतजार है।
स्वास्थ्य विभाग से जनता का सीधा सवाल
सरकारी अस्पताल में आने वाली दवाएं गरीब मरीजों के लिए जीवन की उम्मीद होती हैं। इसलिए ऐसी सामग्री के रख-रखाव, वितरण, स्टॉक और निस्तारण में पारदर्शिता बेहद जरूरी है।
न दवा गायब होनी चाहिए, न दवा बर्बाद होनी चाहिए और न ही दवा के नाम पर किसी तरह का खेल होना चाहिए।
वायरल वीडियो ने भले ही कुछ मिनटों के दृश्य सामने रखे हों, लेकिन उसने स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
अब निगाहें जिलाधिकारी के निर्देश पर होने वाली जांच और उसकी रिपोर्ट पर टिकी हैं।
आग कुछ कार्टूनों में लगी थी, लेकिन सवाल पूरे स्वास्थ्य तंत्र की कार्यप्रणाली पर उठ खड़े हुए हैं।
और जनता का सवाल बिल्कुल सीधा है।
“अगर सब कुछ सही था, तो जांच से डर कैसा। और अगर कुछ गलत था, तो जिम्मेदार कौन।
जांच निष्पक्ष हो, रिपोर्ट सार्वजनिक हो और यदि कोई दोषी मिले तो जिम्मेदारी तय हो यही जनता की उम्मीद है।











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