विंध्यधाम के प्रधान अर्चक अगस्त जी को संजीव सान्याल ने किया सम्मानित

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मीरजापुर

प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल ने अपने दौरे के दूसरे दिन मंगलवार को नगर के लोहिया तालाब स्थित डैफोडिल्स पब्लिक स्कूल में आयोजित विचार गोष्ठी में भाग लिया। इस मौके पर नगर पालिका अध्यक्ष श्यामसुंदर केशरी, विद्यालय के डायरेक्टर अमरदीप सिंह व अपराजिता सिंह सहित अन्य लोगों ने उन्हें अंगवस्त्र और मोमेंटो भेंट कर स्वागत किया। छात्राओं ने स्वागत गीत प्रस्तुत कर उनका अभिनंदन किया। सान्याल ने छात्राओं के प्रेजेंटेशन को देखा और उनसे संवाद भी किया।

इस अवसर पर संजीव सान्याल ने प्रोजेक्टर के माध्यम से भारतीय नौसेना के जहाज आईएनएसवी कौंडिन्य के निर्माण और उसकी समुद्री यात्रा का विस्तृत अनुभव साझा किया। उन्होंने बताया कि दो हजार वर्ष पहले लोग बिना कील या धातु के उपयोग के केवल लकड़ी के तख्तों और रस्सियों से सिलकर जहाज बनाते थे। इसके अवशेष न होने के कारण उन्होंने देशभर के कई राज्यों में नाव निर्माताओं से मुलाकात की।

सिक्कों पर उभरे चित्रों और अजंता गुफाओं की तस्वीरों से प्रेरणा लेकर उन्होंने केरल के एक पारंपरिक परिवार और कुशल कारीगरों की मदद से इस सिले हुए जहाज का निर्माण कराया। इसमें लकड़ी के तख्तों को नारियल के रेशे की रस्सी से जोड़ा गया तथा प्राकृतिक रेजिन, कपास और तेलों से सील किया गया।

सान्याल ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रस्तुति देने के बाद मोदी ने कहा था- “बनाओ, लेकिन डूबना नहीं।” इसके बाद परियोजना को मंजूरी मिली। लगभग दो वर्ष की कड़ी मेहनत और कई परीक्षणों के बाद जहाज तैयार हुआ। इसे औपचारिक रूप से नौसेना में शामिल कर भारतीय नाविक कौंडिन्य के नाम पर आईएनएसवी कौंडिन्य नाम दिया गया।

पोरबंदर से ओमान के मस्कट तक की यात्रा में हवा के सहारे जहाज चला, पानी मटकों में भरा गया, सब्जियां केवल पांच दिन चलीं, खिचड़ी-मैगी पर गुजारा करना पड़ा। रोशनी के लिए चांद की रोशनी पर निर्भर रहना पड़ा और डेक पर ही कंबल ओढ़कर सोना पड़ा।

नगर पालिका अध्यक्ष श्यामसुंदर केशरी ने कहा कि इस जहाज के निर्माण से भारतीय ऐतिहासिक परंपरा फिर जीवंत हुई है। सान्याल जी की खोज और मेहनत से भारत ने ऐसा प्राचीन जहाज बनाया है, जो विश्व में कहीं और उपलब्ध नहीं है। इसमें किसी धातु या कील का उपयोग नहीं किया गया।

उन्होंने बताया कि प्राचीन काल में चुनार भी महत्वपूर्ण व्यावसायिक केंद्र था, जहां कई जहाज रुकते थे। इसी शोध के सिलसिले में सान्याल मीरजापुर आए। वार्ता के बाद रामबली निषाद से मिलकर बिना कील-धातु की एक छोटी नाव बनाकर उन्हें भेंट की गई। उद्देश्य यह है कि मीरजापुर में पारंपरिक नाव निर्माण को बढ़ावा मिले, व्यापार बढ़े, निषाद समाज आर्थिक रूप से सशक्त हो और क्षेत्र का चतुर्दिक विकास हो।

 

रिपोर्ट भोलानाथ यादव

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