लखनऊ
फतेहपुर जनपद की बिंदकी तहसील निवासी पूर्व वायुसैनिक इन्द्रेश कुमार के मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के माननीय न्यायमूर्ति आलोक माथुर एवं माननीय न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने भारत सरकार रक्षा मंत्रालय द्वारा, सशत्र बल अधिकरण लखनऊ के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करते हुए पूर्व वायुसेना कर्मी के दिव्यांगता पेंशन के अधिकार को बरकरार रखा है। न्यायालय ने भारत सरकार रक्षा मंत्रालय को निर्देशित किया है कि, वायु वीर को तत्काल प्रभाव से नियमानुसार दिव्यांगता पेंशन तथा उससे संबंधित समस्त लाभ प्रदान किए जाएं।
इन्द्रेश कुमार ने 09 अक्टूबर 1984 को भारतीय वायुसेना में सेवा ग्रहण की थी तथा 30 सितंबर 2022 को अधिवर्षता की आयु पूर्ण होने पर तीस प्रतिशत डायबिटीज, तीस प्रतिशत उच्च रक्तचाप और पन्द्रह प्रतिशत दाहिनी आंख में मोतियाबिंद के साथ रिलीज मेडिकल बोर्ड की सलाह के आधार पर सेवा से मुक्त हुए। इसके बावजूद मेडिकल बोर्ड ने संबंधित दिव्यांगताओं को वायु सेवा से न तो संबंधित और न ही सैन्य सेवा से बढ़ी हुई माना तथा दिव्यांगता पेंशन का दावा अस्वीकार कर दिया गया।
दिव्यांगता पेंशन अस्वीकार किए जाने के विरुद्ध इन्द्रेश कुमार ने सशस्त्र बल अधिकरण, क्षेत्रीय पीठ, लखनऊ के समक्ष वाद योजित किया था जिसमें अधिकरण ने उनके पक्ष में निर्णय देते हुए दिव्यांगता पेंशन प्रदान करने का आदेश दिया। लेकिन, भारत सरकार ने अधिकरण के निर्णय को चुनौती देते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय में रिट याचिका दाखिल की।
माननीय उच्च न्यायालय ने मेडिकल बोर्ड की कार्यवाही का विस्तृत परीक्षण करते हुए पाया कि दिव्यांगताओं को सैन्य सेवा से असंबद्ध मानने के निष्कर्ष के समर्थन में पर्याप्त एवं स्पष्ट कारण दर्ज नहीं किए गए थे। याची के अधिवक्ता विजय कुमार पाण्डेय ने याची का पक्ष रखते हुए दलील दी कि, लंबी वायु सेवा, मेडिकल बोर्ड की राय मनमाने तरीके से दिया जाना, और बीमारियों को सेवा से संबंधित न होना बताना, बगैर किसी मेडिकल आधार के स्वीकार नहीं किया जा सकता l
न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि मेडिकल बोर्ड द्वारा अपने निष्कर्ष के कारणों को दर्ज करना केवल औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह अत्यंत महत्वपूर्ण, निर्णायक एवं आवश्यक है, क्योंकि मेडिकल बोर्ड की राय के आधार पर किसी सैनिक को दिव्यांगता पेंशन जैसे महत्वपूर्ण सेवानिवृत्तिक लाभ से वंचित किया जा सकता है।
न्यायालय ने आगे कहा कि यदि किसी सैनिक को सेवा से मुक्त करने अथवा दिव्यांगता पेंशन से वंचित करने की कार्रवाई ऐसे मेडिकल मत के आधार पर की जाती है जिसमें पर्याप्त कारण नहीं दिए गए हैं, तो ऐसी कार्रवाई कानून की दृष्टि में टिकाऊ नहीं हो सकती। न्यायालय ने इस तथ्य को भी महत्वपूर्ण माना कि लगभग 38 वर्षों तक भारतीय वायुसेना में सेवा की और संबंधित बीमारियां सेवा में प्रवेश के कई वर्षों बाद सामने आईं।
न्यायालय ने पाया कि ऐसी परिस्थिति में मेडिकल बोर्ड के लिए यह आवश्यक था कि वह स्पष्ट एवं पर्याप्त कारणों के साथ यह बताए कि बीमारी सेवा में प्रवेश के समय क्यों नहीं पाई गई तथा बाद में उत्पन्न बीमारी को सैन्य सेवा की परिस्थितियों से किस आधार पर असंबद्ध माना गया यह माननीय उच्च न्यायालय द्वारा धर्मवीर सिंह बनाम भारत संघ में प्रतिपादित सिद्धांतो के विपरीत है न्यायालय ने माना कि यदि सेवा में प्रवेश के समय किसी बीमारी या दिव्यांगता का उल्लेख नहीं है, तो लागू नियमों के अधीन सैनिक के सेवा में प्रवेश के समय स्वस्थ होने की धारणा को महत्व दिया जाना चाहिए। साथ ही, उचित संदेह का लाभ भी दावेदार को दिया जाना चाहिए।
दिव्यांगता पेंशन से संबंधित प्रावधान कल्याणकारी एवं सामाजिक सुरक्षा की प्रकृति के हैं और इसलिए उनका उदार एवं लाभकारी अर्थान्वयन किया जाना चाहिए।
माननीय उच्च न्यायालय ने मेडिकल बोर्ड की कार्यवाही, संबंधित नियमों, सशस्त्र बल अधिकरण के निर्णय तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित विधिक सिद्धांतों का परीक्षण करने के बाद अधिकरण के निर्णय में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं पाया। और निर्देशित किया कि, वायुवीर को तत्काल प्रभाव से दिव्यांगता पेंशन तथा उससे संबंधित सभी लाभ नियमानुसार प्रदान किए जाएं।
भारत सरकार द्वारा दाखिल रिट याचिका को न्यायालय ने गुणरहित पाते हुए खारिज कर दिया। न्यायालय ने धर्मवीर सिंह के साथ-साथ राजूमोन टी.एम. बनाम भारत संघ के सिद्धांतों को भी ध्यान में रखा।
यह निर्णय पूर्व सैनिकों एवं सशस्त्र बलों के कर्मियों के दिव्यांगता पेंशन संबंधी अधिकारों की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि मेडिकल बोर्ड की राय को केवल इसलिए यांत्रिक रूप से स्वीकार नहीं किया जा सकता कि वह मेडिकल बोर्ड की राय है। यदि मेडिकल बोर्ड की राय के आधार पर किसी सैनिक को दिव्यांगता पेंशन से वंचित किया जाना है, तो उस राय में चिकित्सकीय इतिहास, सेवा परिस्थितियों तथा लागू नियमों के आधार पर स्पष्ट, ठोस एवं पर्याप्त कारण होना आवश्यक है।
यह निर्णय इस महत्वपूर्ण सिद्धांत को मजबूत करता है कि राष्ट्र की दीर्घकालीन सेवा करने वाले सैनिक को केवल अस्पष्ट अथवा कारणरहित मेडिकल राय के आधार पर उसके वैधानिक दिव्यांगता पेंशन के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।











Users Today : 29
Users This Year : 23640
Total Users : 36233
Views Today : 48
Total views : 71151