वाराणसी नगर निगम का शहर की सीमा के भीतर खुली मांस और मछली की दुकानों को हटाकर बाहर शिफ्ट करने का फैसला नई बहस को जन्म दे रहा है। तर्क दिया जा रहा है कि खुले में मांस-मछली की बिक्री से लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या भावनाएं सिर्फ सड़क किनारे लगी दुकानों से ही आहत होती हैं?
अगर शहर की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को बचाने की चिंता है, तो फिर बड़े होटलों और रेस्टोरेंट में खुलेआम परोसे जा रहे नॉनवेज व्यंजन इस दायरे से बाहर क्यों हैं? क्या नियम सिर्फ छोटे कारोबारियों के लिए हैं और बड़े प्रतिष्ठानों के लिए अलग पैमाना है?
इतना ही नहीं, काशी की पहचान गंगा और घाटों से है, लेकिन इन्हीं घाटों के आसपास कई जगहों पर खुलेआम शराबखोरी के दृश्य भी देखने को मिलते हैं। यदि आस्था और संस्कृति को आधार बनाकर फैसले लिए जा रहे हैं, तो शराब की बिक्री और सेवन पर भी समान रूप से विचार होना चाहिए।
आधे-अधूरे फैसले हमेशा सवाल खड़े करते हैं। यदि वाराणसी को वास्तव में धार्मिक नगरी की तर्ज पर विकसित करना है, तो नीति सबके लिए समान होनी चाहिए—या तो पूरे शहर को अयोध्या और हरिद्वार की तरह नॉनवेज और शराब मुक्त घोषित किया जाए, या फिर केवल चुनिंदा वर्गों और व्यवसायों पर कार्रवाई कर दोहरे मापदंड न अपनाए जाएं। जनता अब यही पूछ रही है कि आखिर नियम सबके लिए एक जैसे कब होंगे?











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