“जय देवि समस्तशरीरधरे ,
जय नाकविदर्शिनि दु:खहरे ।
जय व्याधिविनाशिनि मोक्षकरे ,
जय वाञ्छितदायिनि सिद्धिवरे।।”
(भावार्थ )–
हे देवि! आपकी जय हो। आप समस्त शरीरों को धारण करने वाली, स्वर्ग लोक का दर्शन कराने वाली और दु:खहारिणी हो। हे व्याधिनाशिनी देवि! आपकी जय हो! मोक्ष आपके करतलगत है, हे मनोवांछित फल देने वाली अष्ट सिद्धियों से सम्पन्न परा देवि! आपकी जय हो।
“न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो
न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः
न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं
परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम्।।”
(अर्थ )-
हे मॉ जगदम्बा ! मैं न तो मन्त्र जानता हूँ , न यन्त्र; अहो ! मुझे स्तुति का भी ज्ञान नही है | न आवाहन का पता है न ध्यान का | स्तोत्र और कथा की भी जानकारी नहीं है | न तो आपकी मुद्रायें जानता हूँ और न मुझे व्याकुल होकर विलाप करना ही आता है; परंतु एक बात जानता हूँ , केवल तुम्हारा अनुसरण – तुम्हारे पीछे चलना | जो कि समस्त क्लेशों को – समस्त दुःख- विपत्तियों को हर ( दूर कर ) लेने वाला है।
रिपोर्ट – ,जगदीश शुक्ला











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