वाराणसी।
देवाधिदेव महादेव की नगरी काशी में महाशिवरात्रि का पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सदियों पुरानी लोकपरंपराओं और आस्थाओं का जीवंत उत्सव है। इसी परंपरा के निर्वाह के तहत महाशिवरात्रि पर काशीपुराधिश्वर महादेव माता गौरा को लाने के लिए प्रतीकात्मक स्वरूप में सिगोंल (दंड) के साथ राजसी ठाठ-बाट में नगर भ्रमण पर निकलेंगे। इस दौरान बाबा का स्वरूप अन्य पर्वों से सर्वथा भिन्न और विशिष्ट होगा।
चार बार नगर भ्रमण, लेकिन महाशिवरात्रि का स्वरूप सबसे अलग
परंपराओं वाले शहर काशी में बाबा विश्वनाथ वर्ष में चार बार चल स्वरूप में नगर भ्रमण पर निकलते हैं, किंतु महाशिवरात्रि का नगर भ्रमण सबसे अलग और विशिष्ट माना जाता है। इस दिन काशीपुराधिश्वर माता गौरा के बिना, अकेले राजसी स्वरूप में अपने अडभंगी भक्तों और गणों के साथ दिखाई देते हैं। यह परंपरा शिव के वैराग्य, तप और दांपत्य भाव के अनूठे संतुलन को दर्शाती है।
तीन पर्वों पर सपरिवार देते हैं दर्शन
काशी की प्राचीन लोकपरंपरा के अनुसार हर वर्ष सावन पूर्णिमा, दीपावली के दूसरे दिन मनाए जाने वाले अन्नकूट महोत्सव और रंगभरी एकादशी के अवसर पर टेढ़ीनीम स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर के महंत आवास से बाबा विश्वनाथ की चल प्रतिमा को विधि-विधानपूर्वक लाकर मंदिर के गर्भगृह में विराजमान कराया जाता है। इन तीनों अवसरों पर काशीपुराधिश्वर माता गौरा और प्रथमेश के साथ सपरिवार प्रतीकात्मक नगर भ्रमण में भक्तों को दर्शन देते हैं।
महाशिवरात्रि पर अकेले निकलते हैं गौरा को लाने
लोकमान्यता के अनुसार महाशिवरात्रि पर बाबा विश्वनाथ माता गौरा को लेने अकेले ही निकलते हैं। यही कारण है कि इस दिन बाबा का श्रृंगार, उनका वाहन, छत्र, सिगोंल और सिंहासन सभी कुछ विशेष रूप से तैयार किया जाता है। यह परंपरा शिव-विवाह की पूर्व संध्या का प्रतीक मानी जाती है, जिसमें बाबा दूल्हे के रूप में गौरा को लेने निकलते हैं।
नवरत्नों से सुसज्जित छत्र और नवग्रह की काष्ठ से बने सिंहासन पर विराजेंगे महादेव
शिवाजंली के संयोजक संजिव रत्न मिश्र ने बताया इस वर्ष काशी की ऐतिहासिक शिव-बारात में काशीपुराधिश्वर का प्रतीकात्मक चल स्वरूप विशेष आकर्षण का केंद्र रहेगा। बाबा नवरत्नो से सुसज्जित राजसी छत्र और सिगोंल के साथ 11 प्रकार की काष्ठ से बने भव्य सिंहासन पर विराजमान रहेंगे। इन काष्ठों का धार्मिक और ज्योतिषीय महत्व बताया जाता है, जो नवग्रहों का भी प्रतीक माने जाते हैं। बाबा के छत्र का निर्माण श्री काशी विश्वनाथ डमरू सेवा समिति के ओम शकर शर्मा “मोनू बाबा और “पागल बाबा” ने कराया है।
अडभंगी भक्तों संग निकलती है शिव-बारात
महाशिवरात्रि की शिव-बारात काशी की सबसे अनूठी और जीवंत परंपराओं में से एक है। इसमें बाबा के साथ उनके अडभंगी, वैरागी, नागा साधु और गण शामिल होते हैं। ढोल-नगाड़ों, डमरुओं की नाद और हर-हर महादेव के जयघोष के बीच निकलने वाली यह बारात श्रद्धा, उल्लास और लोकसंस्कृति का अद्भुत संगम प्रस्तुत करती है।
लोकाचार में बसती है काशी की आत्मा
महंत वाचस्पती तिवारी ने बताया काशी में महाशिवरात्रि का आयोजन केवल मंदिर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह पूरे नगर की लोकचेतना में रच-बस जाता है। घर-घर में दीप प्रज्ज्वलन, व्रत-उपवास, शिवभक्ति और बारात के स्वागत की परंपरा निभाई जाती है। काशीपुराधिश्वर का यह प्रतीकात्मक नगर भ्रमण सदियों से चली आ रही उस लोकपरंपरा का साक्ष्य है, जिसमें भगवान शिव को नगर का राजा और काशीवासियों को उनका परिवार माना जाता है।
महाशिवरात्रि को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखा जा रहा है। बाबा के राजसी स्वरूप और ऐतिहासिक शिव-बारात के दर्शन के लिए देश-विदेश से भक्त काशी पहुंच रहे हैं। महंत परिवार और परंपराओं से जुड़े परिवारों द्वारा सभी तैयारियां पूर्ण कर ली गई हैं।










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