वाराणसी, 09/2/2026
उत्तर प्रदेश में चल रहे ४० दिवसीय ‘उप्र राज्यमाता अभियान’ के ११वें दिन, परमाराध्य उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामिश्रीः अविमुक्तेश्वरानन्दः सरस्वती ‘1008’ ने प्रदेश सरकार की वर्तमान नीतियों, बढ़ते मांस उत्पादन और राजकीय संरक्षण में चल रही वधशालाओं को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं।
इस विज्ञप्ति में पूज्य महाराजश्री ने न केवल सरकारी आंकड़ों के माध्यम से शासन को घेरा है, अपितु आगामी १ मार्च २०२६ को काशी में ‘वेतन और वैराग्य’ विषय पर एक ऐतिहासिक शास्त्रार्थ की भी घोषणा की है।
जनहित और धर्म-रक्षा से जुड़े इस महत्वपूर्ण विषय को आपके प्रतिष्ठित समाचार माध्यम में स्थान देने हेतु नीचे पूर्ण प्रेस विज्ञप्ति संलग्न है:
(यहाँ से विज्ञप्ति प्रारम्भ)
॥ प्रेस विज्ञप्ति ॥
सम्बोधक: ‘परमाराध्य’ परमधर्माधीश उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामिश्रीः अविमुक्तेश्वरानन्दः सरस्वती ‘1008’
स्थान: श्री विद्यामठ, काशी | तिथि: ९ फरवरी २०२६ सन्दर्भ: ४० दिवसीय ‘उत्तर प्रदेश राज्यमाता अभियान’ का ११वाँ दिन शीर्षक: “योगी सरकार में गौ-भक्ति का मुखौटा और कसाई-तंत्र को ५ करोड़ का राजकीय तिलक: जगद्गुरु शंकराचार्य”
सम्मानित पत्रकार बन्धुओ!
विगत माघ मेले में प्रदेश की तथाकथित हिन्दू सरकार ने अपने तथाकथित गेरुआधारी मुख्यमंत्री के नेतृत्व में हमसे २४ घंटे में शंकराचार्य होने का प्रमाण मांगने का दुस्साहस किया था, जिसे हमने समयसीमा में ही दे दिया था। इसके प्रत्युत्तर में हमने उन्हें उनके ‘असली हिन्दू’ होने को प्रमाणित करने के लिये उदारतापूर्वक ४० दिन का समय दिया था,
जिसके आज दस दिन व्यतीत हो चुके हैं। अत्यन्त दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि इन दस दिनों में इस सरकार और इसके तथाकथित महन्त मुख्यमंत्री ने अपने असली हिन्दू होने का कोई प्रमाण तो नहीं दिया, अपितु अपने आचरण से ‘नकली हिन्दू’ अर्थात् ‘कालनेमि’ होने के संकेत सार्वजनिक कर दिये हैं।
प्रथम दृष्टया, इन्होंने अपने पशुपालन मंत्री के माध्यम से यह निर्लज्ज स्वीकारोक्ति करवाई कि उत्तर प्रदेश सरकार गाय नहीं, बल्कि भैंस, बकरा और सुअर कटवाती है। यह सुनकर हर असली हिन्दू और स्वयं गुरु गोरखनाथ जी भी लजाये होंगे कि उनकी परम्परा में ऐसा व्यक्ति आया है जो करोड़ों जीवों की हत्या कर मांस बेच रहा है।
दूसरा कृत्य इन्होंने यह किया कि जीव-हिंसा को बढ़ावा देने वाले ‘केन्द्रीय बजट २०२६’ का स्वागत कर उसे ऐतिहासिक बताया, जो मांस निर्यातकों को ३% अतिरिक्त ड्यूटी-फ्री छूट दे रहा है। यह सिद्ध करता है कि शासन की प्राथमिकता ‘धर्ममर्यादा’ नहीं, बल्कि ‘मांसलमुद्रा’ (रक्त-रंजित धन) है। आंकड़ों की सचाई यह है कि २०१७ में योगी जी के मुख्यमंत्री बनने के पहले प्रदेश का मांस उत्पादन लगभग ७.५ लाख टन था, जो आज दोगुना होकर १३ लाख टन के पार पहुँच गया है।
वधशालाओं की संख्या कागजों पर भले कम हुई हो, किन्तु पशुओं के वध की गति और मात्रा में ६०% की वृद्धि हुई है। पूर्व में जिन्हें ‘अपराधी’ माना जाता था, आज उन्हें ‘उद्योग’ मानकर ३५% सब्सिडी (५ करोड़ रुपये तक) का राजकीय तिलक लगाया जा रहा है। योगी जी के पिछले ९ वर्षों में प्रदेश में १६ करोड़ से अधिक निरपराध जीवों, जिसमें ४ करोड़ भैंस-वंश सम्मिलित हैं, का रक्त बहाये जाने का अनुमान है। क्या १६ करोड़ पशुओं की चीखें एक ‘योगी’ के कानों तक नहीं पहुँचतीं?
हैरानी है कि जहाँ किसान त्रस्त है, वहीं अल्लाना ग्रुप जैसे मांस निर्यातकों से करोड़ों का चुनावी चंदा (इलेक्टोरल बॉन्ड) लेकर उन्हें राजकीय संरक्षण दिया जा रहा है। गुजरात के विधायक अमित शाह (एलिसब्रिज) ने हाल ही में ३२ करोड़ का बूचड़खाना बजट वापस करवाकर सिद्ध किया है कि जहाँ चाह है वहाँ राह है, किन्तु यहाँ ‘पवित्रता’ पर ‘पूँजी’ हावी है।
शास्त्रीय दृष्टि से भी यहाँ भारी संकट है। सिद्ध सिद्धांत पद्धति के अनुसार संन्यासी के लिए ‘भृति’ (वेतन) विष है। मुख्यमंत्री जी उसी राजकोष से वेतन और सुविधाएं ले रहे हैं जो कसाईखानों के हिंसक राजस्व से भर रहा है। एक महन्त और एक सेक्युलर मुख्यमंत्री की दो विरोधी शपथों के बीच फंसा व्यक्ति धर्म-रक्षा कैसे करेगा? अतः, शास्त्रीय मर्यादा की शुद्धि हेतु हमने निर्णय लिया है कि १९ फरवरी २०२६ (अभियान के २१वें दिन) देश भर में स्वतंत्र विमर्श होगा,
१ मार्च २०२६ (३१वें दिन) काशी में ‘अखिल भारतीय संत/विद्वद्गोष्ठी’ में ‘वेतन और वैराग्य’ पर शास्त्रार्थ कराया जायेगा, तथा ११ मार्च २०२६ (४१वें दिन) लखनऊ में अभियान का अंतिम निष्कर्ष एवं आगामी ‘धर्म-शासनादेश’ प्रसारित किया जायेगा। आशा है कि शेष ३० दिनों में योगी जी आत्म-चिंतन करेंगे और गोमाता को ‘राज्यमाता’ घोषित कर यह क्रूर कारोबार बंद करेंगे।











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