सोनभद्र: ‘मानवाधिकार’ के नाम पर वसूली का साम्राज्य? प्रशासन ने कसी नकेल, RTI के बाद बड़ी जांच शुरू

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सोनभद्र

जनपद में समाज सेवा और मानवाधिकार की आड़ में चल रहे कथित भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी के खेल पर अब प्रशासन का चाबुक चलना शुरू हो गया है। ‘समग्र मानवाधिकार एसोसिएशन’ (रजि. नं.- S/212/012) की संदिग्ध गतिविधियों को लेकर ‘दैनिक अयोध्या टाइम्स’ और ‘गुड मॉर्निंग भारत’ में प्रकाशित खबरों के बाद जिलाधिकारी कार्यालय ने मामले में कड़ा रुख अपनाया है।

​ RTI में उठाए गए 7 तीखे सवाल, जिनसे मचा हड़कंप

​संस्था के विरुद्ध दाखिल की गई आरटीआई (RTI) ने कई ऐसे सवाल खड़े किए हैं, जिन्होंने संस्था के पदाधिकारियों की रातों की नींद उड़ा दी है। आरटीआई के जरिए प्रशासन से इन बिंदुओं पर जवाब मांगा गया था:

•​ पदों की खरीद-फरोख्त:

क्या संस्था में सेवा के नाम पर पदों की खुली बोली लगाई जा रही है और अवैध वसूली हो रही है?

•​ राजकीय प्रतीकों का दुरुपयोग:

एक निजी संस्था ‘भारत सरकार’ की शब्दावली, सरकारी सील और प्रतीकों का इस्तेमाल किस आधार पर कर रही है?

•​ बिना NOC के संचालन:

छपका (राबर्ट्सगंज) स्थित कार्यालय के पास नगर पालिका या अग्निशमन विभाग की एनओसी (NOC) है या नहीं?

•​ अपराधिक रिकॉर्ड की जांच:

संस्था के मुख्य पदाधिकारियों का पुलिस चरित्र सत्यापन (Character Verification) कराया गया है या नहीं?

प्रशासन की कार्रवाई: धारा 6(3) के तहत जांच आगे बढ़ी

​इस मामले में ताजा अपडेट यह है कि जिलाधिकारी कार्यालय, सोनभद्र ने प्राप्त आवेदन का अवलोकन करने के बाद इसे सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 6(3) के अंतर्गत संबंधित विभाग के लोक सूचना अधिकारी को हस्तांतरित कर दिया है। पत्रांक 235/जन सूचना-6(3)-2026 के माध्यम से प्रशासन ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि संबंधित विभाग समय-सीमा के भीतर आवेदक को वांछित सूचना उपलब्ध कराए।

​ पंजीकरण निरस्तीकरण की लटकी तलवार

​अखबारों में छपी रिपोर्ट और आरटीआई के सक्रिय होने के बाद अब संस्था के अस्तित्व पर ही संकट के बादल मंडराने लगे हैं। शिकायतकर्ता ने इन अनियमितताओं के आधार पर संस्था का पंजीकरण रद्द करने के लिए ‘रजिस्ट्रार ऑफ सोसाइटीज’ को संस्तुति भेजने की मांग भी की है।

बेचैनी में संस्था के ”सिपहसालार

अखबार की सुर्खियां बनने और  प्रशासनिक जांच शुरू होने के बाद संस्था के भीतर हड़कंप का माहौल है। सूत्रों के अनुसार, कई सदस्य इस कानूनी पचड़े से बचने के लिए किनारा करने लगे हैं। बुद्धिजीवियों का स्पष्ट कहना है कि समाज सेवा के नाम पर “मानवाधिकार का चोला” ओढ़कर सरकारी साख से खिलवाड़ करने वाली ऐसी संस्थाओं पर कठोर दंडात्मक कार्रवाई अनिवार्य है।

​प्रशासनिक स्तर पर मामला आगे बढ़ने से अब यह साफ हो गया है कि मानवाधिकार के नाम पर निजी स्वार्थ सिद्ध करने वाले ‘सफेदपोशों’ की खैर नहीं है। जनता अब अगले कदम और विभाग के आधिकारिक जवाब का इंतज़ार कर रही है।

 

 

रिपोर्ट – जगदीश शुक्ला

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