याद कीजिए धनंजय चटर्जी कांड। 1990 में एक नाबालिग लड़की का इसी के फ्लैट में रेप के बाद हत्या हो जाती है।

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सोसायटी का चौकीदार धनंजय चटर्जी पर आरोप लगता है और आखिरकार सुप्रीम कोर्ट तक में उसे फांसी की सजा दी जाती है। साल 2004 में उसे फांसी पर लटका भी दिया जाता है। बाद में पता चलता है कि नीचे से लेकर ऊपर तक सबूतों के मामले में भारी गड़बड़ी है। मसलन, मृतका का कमरा अन्दर से बंद मिला था। जबकि आरोपी फरार था।

रेप से पहले मृतका के साथ हाथापाई हुई थी, लेकिन आरोपी के कपड़े पर खून के धब्बे या शरीर पर खरोंच के निशान नहीं थे। ये सबकुछ 20 मिनट में कैसे हो सकता था? DNA टेस्ट भी नहीं हुआ था। दरअसल, बाद में कई रिपोर्ट में ये बात सामने आई कि मीडिया द्वारा धनंजय चटर्जी को मौत की सजा देने के लिए लगातार चलाई जा रही मुहिम का भयानक दबाव कोर्ट पर पड़ा और सबूतों में तमाम खामियों के बाद भी उसे फांसी की सजा सुना दी गई।

फांसी के तख्त पर खड़े धनंजय चटर्जी के अंतिम शब्द यही थे कि वह निर्दोष है। उसने यह अपराध नहीं किया। यह मीडिया ट्रायल का वीभत्स चेहरा था। धनंजय चटर्जी की फांसी के बाद तो जैसे मीडिया के मुंह खून लग गया और वह नरभक्षी हो गया। वो खुद को पुलिस, जांच अधिकारी और जज मान बैठा। किसी के प्रति कोई जवाबदेही नहीं। टीवी स्क्रीन पर आने वाले एंकर नरपिशाच जैसे लगने लगे। सामने जो दिख जाए सच्चाई केवल उतनी तक नहीं रहती है !

 

रिपोर्ट अशोक कुमार गुप्ता


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