चन्दौली इलिया ।क्षेत्र बाबा जागेश्वर नाथ धाम हेतिमपुर संगीतमय नवदीवसीय श्री राम कथा के बाबा जागेश्व प्रांगण में कथा के चौथे निशा में श्री मानस जी के पूजा पाठ के साथ श्री राम कथा का शुभारंभ हुआ कथा व्यास पंडित रामेश्वरानंद जी ने बताया कि राजा हरिश्चंद्र के पुत्र रोहिताश्व की मृत्यु और उसके बाद उनके श्मशान घाट पर । एक सर्प के काटने से रोहिताश्व की मृत्यु हो गई और रानी तारामती (जिन्हें उस समय शैव्या भी कहा जाता था) अपने मृत पुत्र के शव को लेकर श्मशान गईं, जहाँ राजा हरिश्चंद्र अपने वचन के कारण चांडाल के रूप में सेवा कर रहे
थे।हरिश्चंद्र ने शुल्क न होने के कारण पुत्र का दाह संस्कार करने से मना कर दिया, और अंततः देवताओं ने उनकी परीक्षा लेते हुए उन्हें उनका राज्य, पुत्र और वैभव वापस दे दिया
पुत्र की मृत्युः राजा हरिश्चंद्र के इकलौते पुत्र रोहिताश्व की एक सर्प के डसने से मृत्यु हो गई।
श्मशान घाट पर मिलनः रानी तारामती (शैव्या) अपने पुत्र के शव को लेकर उस श्मशान घाट पर पहुँचीं जहाँ राजा हरिश्चंद्र एक चांडाल के रूप में दासता कर रहे थे।
शुल्क की शर्तः राजा हरिश्चंद्र ने अपने वचन और कर्तव्य का पालन करते हुए, किसी भी शव के दाह संस्कार के लिए शुल्क लेना अनिवार्य बताया। उन्होंने रानी से कहा कि दाह संस्कार के लिए शुल्क चुकाने हेतु वह अपनी साड़ी का एक हिस्सा बेच दें।
कर्तव्य और सत्यनिष्ठाः रानी के पास शुल्क के लिए कुछ नहीं था। ऐसे में राजा की सत्यनिष्ठा और अपने वचन के प्रति निष्ठ
राजा हरिश्चंद्र ने कहा कि धर्मनिरपेक्ष होना चाहिए , धर्म सर्वपरी है ,
कथा व्यास पंडित रामेश्वरानंद जी ने कहा कि धर्म की रक्षा करना हर व्यक्ति का कर्तव्य है, जिससे राष्ट्र निर्माण होती है, प्रभु श्री राम ने धर्म रक्षा के लिए वनवास गये , कथा में संदेश देते हुए कहा कि बेटियां घर की आंगन होती है, पुत्र अगर भाग्य से पैदा होते हैं तो बेटियां सौभाग्य से पैदा होती है , बिटिया के बिना सृष्टि की रचना अकाल्पनिक है
कथा में उपस्थित बाबा जागेश्वर नाथ के महंत अनूप गिरी, श्री राम कथा समिति के अध्यक्ष अरविंद सिंह , वन विभाग चंद्रप्रभा रेंजर अखिलेश दुबे समितिमहामंत्री रामभरोस जायसवाल, धर्मेंद्र मोदनवाल, राजेश यादव सुशील विश्वकर्मा, डॉ रीना, संतोष कुमार, शैलेंद्र सिंह , राजन मोदनवाल, योगेंद्र बहादुर सिंह, राजकुमार पांडे, भुनेश्वरविश्वकर्मा, भारत माली, जयशंकर प्रसाद जायसवाल, शेषनाथ दुबे सैकड़ो की संख्या में राम भक्त ने कथा का रसपान किया।