बुद्ध कथा के तीसरे दिन युवराज सिद्धार्थ के वैराग्य प्रसंग का हुआ वर्णन, कथा सुन श्रद्धालु हुए भाव विभोर

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चन्दौली इलिया

बुद्ध विहार महामाया सरोवर सैदूपुर के तत्वावधान में आयोजित पांच दिवसीय संगीतमय सनातनी बुद्ध धम्म देशना कथा के तीसरे दिन बोधगया से पधारी कथावाचिका भन्ते बंदना ने भगवान बुद्ध के बाल्यकाल से युवावस्था तक के जीवन प्रसंगों का विस्तृत वर्णन किया। कथा के दौरान उन्होंने बताया कि बचपन से ही राजकुमार सिद्धार्थ का स्वभाव अत्यंत शांत, करुणामय और चिंतनशील था। उनके व्यक्तित्व में दया, प्रेम और संवेदनशीलता के गुण स्पष्ट दिखाई देते थे।

कथावाचिका ने कहा कि युवराज सिद्धार्थ अन्य राजकुमारों की तरह सांसारिक सुख-सुविधाओं और भोग-विलास में रुचि नहीं लेते थे। वे अक्सर जीवन के वास्तविक उद्देश्य और मानव दुखों के कारणों पर विचार करते रहते थे। उनके वैराग्यपूर्ण विचारों और संसार से विरक्ति की भावना को देखकर पिता राजा शुद्धोधन चिंतित रहने लगे। उन्हें आशंका थी कि सिद्धार्थ कहीं राजपाट छोड़कर संन्यास का मार्ग न अपना लें।

इसी चिंता के चलते राजा शुद्धोधन ने कम आयु में ही सिद्धार्थ का विवाह राजकुमारी यशोधरा के साथ संपन्न कराया। विवाह के अवसर पर पूरे कपिलवस्तु राज्य को भव्य रूप से सजाया गया। राजमहल से लेकर नगर की गलियों तक उत्सव का वातावरण था। लोगों ने मंगलगीत गाए, दीप प्रज्ज्वलित किए और राजकुमार के विवाह की खुशियां मनाईं। कथावाचिका ने विवाह प्रसंग का विस्तार से वर्णन करते हुए बताया कि राजा को विश्वास था कि पारिवारिक जीवन में प्रवेश करने के बाद सिद्धार्थ का मन सांसारिक जीवन में रम जाएगा, लेकिन उनका अंतर्मन निरंतर मानव कल्याण और सत्य की खोज की ओर आकर्षित होता रहा।

कथा को आगे बढ़ाते हुए भन्ते बंदना ने बताया कि एक दिन युवराज सिद्धार्थ ने प्रकृति के बीच जीवन का ऐसा दृश्य देखा जिसने उनके मन को गहराई से विचलित कर दिया। उन्होंने देखा कि संसार में एक बड़ा जीव छोटे जीव का शिकार कर रहा है। कहीं हिंसा है, कहीं भय है और कहीं कमजोर पर अत्याचार हो रहा है। यह देखकर उनका हृदय करुणा से भर उठा। उन्होंने अनुभव किया कि इस संसार में दुख, पीड़ा और असमानता व्याप्त है तथा इन समस्याओं का समाधान खोजा जाना आवश्यक है।

कथावाचिका ने कहा कि यही घटनाएं आगे चलकर सिद्धार्थ के जीवन में वैराग्य और सत्य की खोज का आधार बनीं। मानव मात्र के दुखों को दूर करने और शांति का मार्ग खोजने की भावना उनके भीतर निरंतर प्रबल होती गई। बाद में यही राजकुमार सिद्धार्थ ज्ञान प्राप्त कर भगवान बुद्ध बने और उन्होंने पूरी दुनिया को करुणा, अहिंसा, मैत्री और मानवता का संदेश दिया।

इस अवसर पर डॉ गीता शुक्ला,राजन केसरी, सनोज, क्रांति कुमार, बागान, बुद्ध प्रताप मौर्य, मनगोई बौद्ध, गौरीशंकर मौर्य, लालजी, नंदलाल, नंदलाल शास्त्री, श्रीकांत मौर्य, रमाकांत पाल, चक्रधारी वर्मा, शकुंतला देवी, श्यामा देवी, सुमित्रा नवज्योति, खुशी मौर्य, सहित क्षेत्र के अनेक बौद्ध अनुयायी उपस्थित रहे।

 

रिपोर्ट – अलीम हाशमी

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