चंदौली जनपद में विकास की तेज रफ्तार ने जहां आधुनिक सुविधाएं दी हैं, वहीं सदियों पुरानी परंपराएं धीरे-धीरे खत्म होती जा रही हैं। कभी हर गांव की शान और पहचान रहे कुएं आज पूरी तरह गुमनामी में खोते नजर आ रहे हैं।
एक दौर था जब कुएं का पानी सबसे शुद्ध और स्वास्थ्यवर्धक माना जाता था। गांव की महिलाएं सुबह-शाम कुएं पर पानी भरने जाती थीं, जहां सिर्फ पानी ही नहीं बल्कि आपसी संवाद, हंसी-मजाक और सामाजिक जुड़ाव भी होता था। उस समय का कुएं का पानी आज के आरओ सिस्टम से भी बेहतर और प्राकृतिक रूप से संतुलित माना जाता था।

लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। हैंडपंप, सबमर्सिबल और आरओ मशीनों के बढ़ते उपयोग ने कुओं को बेकार बना दिया। नतीजा यह है कि दर्जनों गांवों में खोजने पर भी कुएं नजर नहीं आते। जो बचे हैं, वे भी उपेक्षा के कारण बंद या कचरे से पाट दिए गए हैं।
विशेषज्ञों की मानें तो कुओं का खत्म होना सिर्फ एक परंपरा का अंत नहीं, बल्कि जल संकट की ओर बढ़ता खतरा भी है। कुएं प्राकृतिक जल संरक्षण और भूजल रिचार्ज का अहम माध्यम होते थे, जो अब धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं।
ग्रामीण बुजुर्गों का कहना है कि “कुएं सिर्फ पानी का जरिया नहीं थे, बल्कि गांव की संस्कृति और सामाजिक जीवन का अहम हिस्सा थे।”
आज जरूरत है कि इन पारंपरिक जलस्रोतों को बचाने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं। अगर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाली पीढ़ियां सिर्फ किताबों में ही कुओं की कहानी पढ़ेंगी।
रिपोर्ट – अलीम हाशमी









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