अम्बेडकरनगर जनपद के शिक्षा क्षेत्र जहाँगीरगंज में तैनात खंड शिक्षा अधिकारी संतोष पांडेय की कार्यशैली इन दिनों गंभीर सवालों के घेरे में है। आरोप है कि जिन शिकायतों में स्वयं खंड शिक्षा अधिकारी संतोष पांडेय पर आरोप लगाए गए हैं, उन्हीं शिकायतों की जांच और निस्तारण भी वही अधिकारी कर रहे हैं।
इस व्यवस्था ने प्रशासनिक पारदर्शिता और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है।बताया जाता है कि फरवरी 2026 में आईजीआरएस पोर्टल पर दर्ज कई शिकायतों में खंड शिक्षा अधिकारी संतोष पांडेय की कार्यप्रणाली और कार्यालय से जुड़े मामलों को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए थे। इसके बावजूद जांच की जिम्मेदारी भी उसी अधिकारी को सौंप दी गई, जिनके विरुद्ध शिकायत दर्ज है।
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि स्थलीय जांच किए बिना ही कार्यालय में बैठकर औपचारिक और संदिग्ध तरीके से निस्तारण कर दिया जाता है।स्थानीय लोगों का कहना है कि यह स्थिति जब सैंया ही कोतवाल हो वाली कहावत को चरितार्थ करती दिखाई दे रही है। यदि शिकायत की जांच वही अधिकारी करेंगे जिन पर आरोप है तो निष्पक्ष न्याय की उम्मीद कैसे की जा सकती है।
सूत्रों के अनुसार खंड शिक्षा अधिकारी संतोष पांडेय करीब तीन वर्षों से जहाँगीरगंज के बीआरसी कार्यालय देवरिया बुजुर्ग में तैनात हैं। लंबे समय से एक ही स्थान पर जमे रहने को लेकर भी क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है। लोगों का कहना है कि प्रशासनिक नियमों के बावजूद स्थानांतरण न होना कई सवाल खड़े करता है।
शिकायतकर्ताओं का यह भी आरोप है कि विद्यालयों में अनियमितताओं या शिक्षकों की कमियों को लेकर शिकायत करने पर उल्टा शिकायतकर्ता को ही मानसिक दबाव और प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है। कुछ लोगों ने यह भी आरोप लगाया है कि जिन शिक्षकों के खिलाफ शिकायत होती है, उनसे कथित सांठगांठ कर मामलों को दबा दिया जाता है।
मामले को और गंभीर तब माना जा रहा है जब सुनवाई के दौरान मोबाइल छीनने का प्रयास किए जाने जैसे आरोप भी सामने आए हैं। यदि इन आरोपों में सच्चाई पाई जाती है तो यह न केवल विभागीय आचार संहिता का उल्लंघन होगा, बल्कि शिक्षा विभाग की साख पर भी सीधा आघात माना जाएगा।
शिकायतकर्ताओं ने मांग की है कि आईजीआरएस पर दर्ज सभी शिकायतों की निष्पक्ष जांच उपजिलाधिकारी एसडीएम स्तर से कराई जाए तथा जांच अवधि के दौरान संबंधित अधिकारी को वर्तमान पद से अलग रखा जाए। साथ ही उन्हें अन्य जनपद या विकास खंड में स्थानांतरित करने की भी मांग उठाई जा रही है, ताकि जांच निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से हो सके।
फिलहाल पूरे मामले पर जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी की ओर से कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ऐसे में बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि आरोपित अधिकारी ही जांचकर्ता बन जाएंगे तो आम नागरिक को न्याय कैसे मिलेगा। शिक्षा विभाग की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए इस प्रकरण में त्वरित और निष्पक्ष कार्रवाई की आवश्यकता बताई जा रही है।










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