भ्रम की राजनीति से बीजेपी के यूसीसी कानून और जनता को उलझाने का बड़ा खेल👇

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बीजेपी की राजनीति अब शासन की नहीं, प्रयोगशाला की राजनीति बन चुकी है। हर कुछ महीनों में एक नया प्रयोग कभी धर्म, कभी जाति, कभी शिक्षा ताकि जनता सवाल पूछने के बजाय पक्ष चुनने में उलझी रहे।

★ यूजीसी क़ानून भी ऐसा ही एक प्रयोग है। न इसे पूरी गंभीरता से लागू करना है, न ही वापस लेना है। इसे केवल हवा में उछालना है, ताकि समाज दो हिस्सों में बँट जाए और असली मुद्दे ज़मीन पर दबे रहें।

█ ध्यान भटकाने की त्रिस्तरीय रणनीति

★ जब मणिकर्णिका घाट जैसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थल के साथ छेड़छाड़ पर सवाल उठते हैं, जब भारत की अंतरराष्ट्रीय साख गिरने की बातें होती हैं, जब अर्थव्यवस्था की साँसें उखड़ती दिखती हैं तब अचानक शंकराचार्य बनाम योगी, यूजीसी बनाम जनरल वर्ग, आरक्षण बनाम मेरिट जैसे मुद्दे उछाल दिए जाते हैं। यह संयोग नहीं है, यह सुनियोजित राजनीतिक ध्यान भ्रम है।

█ अडानी, अर्थव्यवस्था और डर की राजनीति

★ देश की अर्थव्यवस्था आज कुछ चुनिंदा कॉरपोरेट घरानों के इर्द–गिर्द घूम रही है। अडानी समूह को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठ रहे सवालों, विदेशी जाँच एजेंसियों की कार्रवाइयों और संभावित कानूनी संकटों की चर्चाएँ देश के भीतर दबाई जा रही हैं।

★ मरती अर्थव्यवस्था, गिरती शिक्षा, गायब होती तकनीक

★ आज सच्चाई यह है कि अर्थव्यवस्था काग़ज़ों में तेज़ है, ज़मीन पर हाँफ रही है, पड़ोसी देश तकनीक और शिक्षा में आगे बढ़ रहे हैं। भारत शिक्षा के वैश्विक मानकों से फिसल रहा है। रिसर्च, इनोवेशन और टेक्नोलॉजी में भारत दूर–दूर तक दिखाई नहीं देता

लेकिन इन सब पर बात करने की जगह टीवी पर बहस होती है “यूजीसी से किसका नुकसान होगा, कौन देशद्रोही है?” यही तो खेल है।

★ मुझे लगता है की यूजीसी क़ानून का खेल पास भी नहीं तो फेल भी नहीं होगा।

★ बीजेपी जानती है कि यह क़ानून लागू हुआ तो भारी विरोध होगा, वापस लिया तो राजनीतिक नुकसान इसलिए इसे लटका कर रखा गया है।

★ पिछड़ा वर्ग को संदेश “हमने कोशिश की, जनरल वालों ने रुकवा दिया।”

★ जनरल वर्ग को संदेश “देखा, हमने आपकी बात मान ली।”

★ और अंत में मामला ताली से शुरू होकर थाली पर खत्म।

★ भ्रम के इस खेल में कौन जीतता है, न जनरल वर्ग, न पिछड़ा वर्ग, न छात्र, न शिक्षक, जीतती है केवल भ्रम की राजनीति।

★ यहाँ तक कि विपक्ष भी इस खेल को समझ चुका है, बीजेपी के कई शीर्ष नेता भी सच्चाई जानते हैं, लेकिन मशीन चलती रहती है, क्योंकि मशीन को सच नहीं, शोर चाहिए।

★ आज के समय में अंधभक्ति सबसे सुरक्षित निवेश है और बीजेपी को सबसे ज़्यादा भरोसा है उस वर्ग पर जो सवाल नहीं पूछता, जो हर भ्रम को राष्ट्रवाद मान लेता जो हर आलोचना को देशद्रोह समझ लेता है।

★ अंधभक्त इसीलिए ज़रूरी हैं क्योंकि वे सोचते नहीं, सिर्फ़ तालियाँ बजाते हैं।

★ आज देश बेरोज़गारी, महँगाई, शिक्षा और अर्थव्यवस्था से जूझ रहा है और सत्ता जनता को जाति में उलझा रही है, धर्म में बाँट रही है,शिक्षा को हथियार बना रही है।

★ यूजीसी क़ानून कोई सुधार नहीं, ध्यान भ्रम का औज़ार है और जब तक जनता यह नहीं समझेगी तब तक असली मुद्दे मणिकर्णिका घाट की तरह शोर में दफन होते रहेंगे।

 

रिपोर्ट अशोक कुमार गुप्ता

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