भारत की राजनीति में 2013 एक निर्णायक मोड़ था।
उस समय केंद्र में कांग्रेस की UPA सरकार थी। राजस्थान में भी कांग्रेस सत्ता में थी। दूसरी ओर गुजरात में नरेंद्र मोदी एक मजबूत राजनीतिक नेता के रूप में उभर चुके थे।
इसी दौर में आसाराम बापू को गिरफ्तार किया गया।
लेकिन गिरफ्तारी से पहले आसाराम बापू केवल एक धार्मिक गुरु नहीं थे। उनके पास देशभर में फैला विशाल अनुयायी वर्ग, आश्रमों का नेटवर्क, गुरुकुल, सेवा गतिविधियां और वर्षों से चल रहे सामाजिक-सांस्कृतिक अभियान थे।
और सबसे महत्वपूर्ण बात:
आसाराम बापू कांग्रेस की नीतियों और उसके नेतृत्व के खुले आलोचक बन चुके थे।
2013: गिरफ्तारी से ठीक पहले राजस्थान सरकार को चेतावनी
31 अगस्त 2013 को गिरफ्तारी से पहले आसाराम बापू ने अपने अंतिम सत्संगों में से एक में राजस्थान सरकार को खुली चेतावनी दी।
Indian Express ने 4 सितंबर 2013 को रिपोर्ट किया कि आसाराम बापू ने कहा था कि यदि उन्हें झूठे मामले में फंसाया गया तो राजस्थान सरकार को आने वाले चुनावों में भारी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ेगी।
उन्होंने साफ कहा था कि “चुनाव आने वाले हैं” और सरकार को इसके परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।
यह महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि यह बयान गिरफ्तारी से पहले दिया गया था।
इसके कुछ ही महीनों बाद राजस्थान में विधानसभा चुनाव हुए और कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई।
यह कहना कि कांग्रेस केवल आसाराम बापू की वजह से हारी, चुनावी आंकड़ों से सिद्ध नहीं किया जा सकता।
लेकिन यह भी इतिहास का तथ्य है कि आसाराम बापू ने कांग्रेस सरकार को खुले तौर पर चुनौती दी थी और उसके बाद उसी वर्ष राजस्थान में सत्ता परिवर्तन हुआ।
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नरेंद्र मोदी और आसाराम बापू का पुराना संबंध
आज जब नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा की चर्चा होती है, तो यह तथ्य भी सामने रखना चाहिए कि नरेंद्र मोदी और आसाराम बापू का सार्वजनिक संपर्क बहुत पुराना था।
एक पुराने कार्यक्रम में नरेंद्र मोदी ने स्वयं आसाराम बापू के आशीर्वाद का उल्लेख किया था और बताया था कि जब उन्हें कोई नहीं जानता था, तब से उन्हें आसाराम बापू का आशीर्वाद मिलता रहा।
इससे कम-से-कम यह स्पष्ट होता है कि नरेंद्र मोदी और आसाराम बापू का सार्वजनिक संबंध नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से बहुत पहले का था।
आसाराम बापू के अनुयायी इसे नरेंद्र मोदी के राजनीतिक उत्थान में मिले आध्यात्मिक आशीर्वाद के रूप में देखते हैं।
क्या आसाराम बापू के विशाल सामाजिक प्रभाव ने गुजरात में उस सांस्कृतिक वातावरण को मजबूत किया, जिसमें नरेंद्र मोदी और BJP को व्यापक जनसमर्थन मिला?
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राजनाथ सिंह भी पहुंचे थे आसाराम बापू के सत्संग में
2 सितंबर 2012 को राजनाथ सिंह आसाराम बापू के गाजियाबाद सत्संग में पहुंचे थे।
यह उस समय की सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रिकॉर्डिंग में दर्ज है।
बाद के वर्षों में आसाराम बापू से जुड़े मातृ-पितृ पूजन दिवस जैसे अभियानों को राजनीतिक स्तर पर भी समर्थन और मान्यता मिली।
2012 में छत्तीसगढ़ के तत्कालीन मुख्यमंत्री रमन सिंह ने आसाराम बापू की सलाह के बाद 14 फरवरी को सरकारी और निजी स्कूलों में मातृ-पितृ पूजन दिवस मनाने की घोषणा की थी। Indian Express ने इसकी स्पष्ट रिपोर्टिंग की थी।
यानी आसाराम बापू का प्रभाव केवल आश्रमों तक सीमित नहीं था।
उनकी सामाजिक सोच सरकारी नीतियों और सार्वजनिक अभियानों तक पहुंच रही थी।
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मातृ-पितृ पूजन: एक सामाजिक अभियान
आसाराम बापू ने वर्षों पहले युवाओं को पश्चिमी उपभोक्तावादी संस्कृति के बजाय माता-पिता के सम्मान और भारतीय संस्कारों की ओर लौटने का संदेश दिया।
उनके आश्रम की सामग्री में मातृ-पितृ पूजन, बाल संस्कार, युवा मार्गदर्शन और व्यसनमुक्ति जैसे अभियानों का उल्लेख मिलता है।
यहां राजनीतिक सवाल से पहले सामाजिक सवाल खड़ा होता है:
क्या बच्चों को अपने माता-पिता का सम्मान करना सिखाना समाज-विरोधी काम है?
क्या युवाओं को नशे से दूर रहने की प्रेरणा देना गलत है?
क्या भारतीय संस्कृति और परिवार व्यवस्था की बात करना अपराध है?
इन प्रश्नों पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए।
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धर्मांतरण के खिलाफ आवाज
आसाराम बापू ने धर्मांतरण के मुद्दे पर भी लगातार आवाज उठाई।
2006 का शबरी कुंभ इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है।
गुजरात के डांग क्षेत्र में हुए इस आयोजन में आदिवासी समाज, धर्मांतरण और सांस्कृतिक पहचान के मुद्दे प्रमुख थे।
आसाराम बापू सहित कई धार्मिक नेताओं की इसमें उपस्थिति और भूमिका की उस समय रिपोर्टिंग हुई थी।
यह केवल राजनीतिक सभा नहीं थी।
यह आदिवासी समाज में धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान के प्रश्न को राष्ट्रीय चर्चा में लाने वाला बड़ा आयोजन था।
आसाराम बापू के समर्थकों की दृष्टि में यह उनके उन प्रयासों का हिस्सा था, जिनका उद्देश्य आदिवासी समाज को अपनी पारंपरिक सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना था।
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भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलनों के समर्थन का प्रश्न
2011 में अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन देशभर में फैल रहा था।
अन्ना हजारे के आंदोलन को उस समय व्यापक जनसमर्थन मिला और संसद ने उनकी प्रमुख मांगों पर सिद्धांततः सहमति भी व्यक्त की।
आसाराम बापू ने भी उस दौर में भ्रष्टाचार और तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व की नीतियों की आलोचना की थी।
यह महत्वपूर्ण है क्योंकि आसाराम बापू का विरोध केवल किसी एक चुनाव तक सीमित नहीं था।
उनके भाषणों में बार-बार:
भ्रष्टाचार, काला धन, स्वदेशी, भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय चरित्र
जैसे मुद्दे दिखाई देते थे।
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राहुल गांधी पर भी खुलकर टिप्पणी
आसाराम बापू ने कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी की राजनीतिक क्षमता पर भी खुलकर सवाल उठाए।
2011 की रिपोर्टिंग में उन्हें राहुल गांधी को “बबलू” कहकर संबोधित करते और उनके प्रधानमंत्री बनने की क्षमता पर टिप्पणी करते हुए उद्धृत किया गया था।
यानी 2014 के लोकसभा चुनाव से काफी पहले ही आसाराम बापू सार्वजनिक मंचों से कांग्रेस नेतृत्व की आलोचना कर रहे थे।
2013 में उन्होंने सोनिया गांधी और राहुल गांधी की ओर इशारा करते हुए अपने खिलाफ कार्रवाई के पीछे उनकी भूमिका होने का आरोप भी लगाया था।
यह उनका आरोप था, न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य नहीं।
लेकिन इससे इतना जरूर स्पष्ट होता है कि आसाराम बापू उस समय कांग्रेस नेतृत्व के मुखर आलोचक बन चुके थे।
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और फिर आया 2013…
यहीं से पूरी कहानी सबसे ज्यादा राजनीतिक हो जाती है।
31 अगस्त 2013: आसाराम बापू गिरफ्तारी से पहले राजस्थान सरकार को चुनाव की चेतावनी देते हैं।
31 अगस्त 2013: गिरफ्तारी।
दिसंबर 2013: राजस्थान में कांग्रेस सत्ता से बाहर।
मई 2014: केंद्र में कांग्रेस नेतृत्व वाली UPA सत्ता से बाहर।
नरेंद्र मोदी: गुजरात से निकलकर भारत के प्रधानमंत्री बनते हैं।
क्या इन घटनाओं के बीच सीधा कारण-परिणाम संबंध साबित है?
नहीं।
लेकिन क्या यह पूरा घटनाक्रम आसाराम बापू के समर्थकों के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है?
बिल्कुल।
क्योंकि जिस समय आसाराम बापू कांग्रेस सरकारों के खिलाफ खुलकर आवाज उठा रहे थे, उसी दौर के बाद कांग्रेस को लगातार बड़े राजनीतिक झटके लगे।
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क्या आसाराम बापू BJP के लिए काम कर रहे थे?
यहां भी तस्वीर दिलचस्प है।
सार्वजनिक रिकॉर्ड में आसाराम बापू के संपर्क केवल BJP नेताओं से नहीं थे।
कांग्रेस के नेताओं के साथ भी उनके संपर्क रहे।
यानी उन्हें केवल BJP का “राजनीतिक साधन” कहना भी पूरी कहानी नहीं बताता।
असल में उनकी ताकत किसी राजनीतिक पार्टी से ज्यादा बड़ी थी:
उनका अपना सामाजिक प्रभाव था।
लाखों-करोड़ों अनुयायियों का नेटवर्क।
सत्संग।
आश्रम।
गुरुकुल।
सेवा।
संस्कार।
नशामुक्ति।
मातृ-पितृ पूजन।
धर्मांतरण विरोध।
भारतीय संस्कृति।
स्वदेशी।
और राष्ट्रभाव।
यही वह सामाजिक शक्ति थी जिसे राजनीति नजरअंदाज नहीं कर सकती थी।
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इसलिए आसाराम बापू को केवल “एक केस” में समेटना क्यों गलत है?
किसी व्यक्ति के खिलाफ चल रहे आपराधिक मामले और उसके दशकों के सामाजिक प्रभाव दो अलग प्रश्न हैं।
कानून अपना काम करे।
अदालत अपना निर्णय दे।
लेकिन क्या किसी व्यक्ति के दशकों के सामाजिक कार्यों पर चर्चा बंद कर देनी चाहिए?
नहीं।
आसाराम बापू के समर्थकों का दावा है कि उनके संस्थानों और अनुयायियों ने देशभर में सेवा, संस्कार, शिक्षा, गौसेवा, स्वास्थ्य, नशामुक्ति और सामाजिक जागरण से जुड़े अनेक कार्य किए।
इनमें से हर दावे को अलग-अलग दस्तावेजों और संस्थागत रिकॉर्ड से जांचा जा सकता है।
लेकिन यह तथ्य छिपाया नहीं जा सकता कि उनका सामाजिक प्रभाव इतना बड़ा था कि:
राजनेता उनके सत्संगों में जाते थे।
सरकारें उनके सुझावों को नीतिगत कार्यक्रमों में अपनाती थीं।
लाखों लोग उनके सत्संगों से जुड़े थे।
और उनकी गिरफ्तारी राष्ट्रीय राजनीतिक बहस का विषय बन गई थी।
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कांग्रेस के पतन की कहानी में आसाराम बापू
कांग्रेस के पतन के कई कारण हैं।
लेकिन अगर भारतीय राजनीति में हिंदू सामाजिक चेतना के विस्तार का इतिहास लिखा जाएगा, तो आसाराम बापू को पूरी तरह हटाकर वह इतिहास अधूरा रहेगा।
क्योंकि उन्होंने वर्षों तक लोगों से कहा:
अपनी संस्कृति को पहचानो।
अपने माता-पिता का सम्मान करो।
नशे से दूर रहो।
भारतीय जीवन-पद्धति अपनाओ।
धर्म और संस्कारों की रक्षा करो।
धर्मांतरण के प्रति जागरूक रहो।
राष्ट्र और समाज के लिए काम करो।
यह संदेश किसी चुनाव के छह महीने पहले नहीं दिया गया था।
यह दशकों तक दिया गया।
और इसी कारण उनके समर्थक मानते हैं कि आसाराम बापू ने भारत में एक ऐसी सामाजिक चेतना तैयार करने में भूमिका निभाई, जिसका राजनीतिक प्रभाव बाद के वर्षों में दिखाई दिया।
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सबसे बड़ा सवाल
क्या यह कहना सही है कि:
“BJP केवल आसाराम बापू की वजह से सत्ता में आई और कांग्रेस केवल आसाराम बापू की वजह से हार गई”?
नहीं। ऐसा दावा प्रमाणित करना संभव नहीं है।
लेकिन क्या यह कहना भी सही होगा कि:
“आसाराम बापू का भारतीय राजनीति और समाज पर कोई प्रभाव नहीं था”?
यह भी सार्वजनिक घटनाओं और उनके व्यापक सामाजिक नेटवर्क को देखते हुए उचित नहीं लगता।
सच्चाई शायद इससे कहीं ज्यादा दिलचस्प है।
आसाराम बापू ने राजनीति से पहले समाज पर काम किया।
और जब समाज की सोच बदलती है, तो राजनीति भी बदलती है।
2013 में उन्होंने राजस्थान सरकार को चुनाव की चेतावनी दी।
2013 में वे गिरफ्तार हुए।
उसी वर्ष राजस्थान में सत्ता बदली।
2014 में केंद्र की सत्ता बदली।
नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने।
और उसके बाद भारतीय राजनीति का पूरा संतुलन बदल गया।
इसे संयोग मानना है या किसी बड़े सामाजिक परिवर्तन की कड़ी, यह इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के लिए खुला प्रश्न है।
लेकिन एक बात निश्चित है:
आसाराम बापू को केवल एक आपराधिक मामले के शीर्षक में समेट देना उनके दशकों के सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव की पूरी कहानी नहीं बताता।
उनके समर्थकों के लिए वे आज भी वही संत हैं, जिन्होंने धर्म, संस्कृति, संस्कार, सेवा और राष्ट्रभाव को जन-जन तक पहुंचाने का काम किया।
और शायद इसी कारण, वर्षों की कानूनी लड़ाई के बावजूद, उनका सामाजिक प्रभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ।
इतिहास का काम किसी व्यक्ति को देवता या दानव बनाना नहीं, बल्कि उसके प्रभाव को समझना है।
और आसाराम बापू का प्रभाव इतना बड़ा था कि उसे अनदेखा करके आधुनिक भारत की सामाजिक-राजनीतिक यात्रा को पूरी तरह समझना कठिन है।








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