जौनपुर
कलम मेरी जिंदगी है।
कलम मेरे इंसाफ का घर है।
कलम मेरी बंदगी है।
कलम तू ही तू है।
जुनून है। सच दिखाने का, हौसला है। सच लिखने का और संकल्प है। उस हर आवाज को बुलंद करने का, जिसे व्यवस्था, दबाव या परिस्थितियां दबाने का प्रयास करती हैं।
पत्रकार सुरेश कुमार शर्मा की कलम से
पत्रकार केवल एक नाम नहीं होता। पत्रकार लोकतंत्र की वह आवाज है। जो सत्ता से सवाल पूछने का साहस रखती है। समाज की पीड़ा को सामने लाती है। और उस व्यक्ति की आवाज बनती है। जिसकी बात शायद किसी बंद कमरे में सुनने वाला कोई नहीं होता।
पत्रकारिता को देश का चौथा स्तंभ कहा जाता है। इसकी वजह केवल यह नहीं कि पत्रकार खबर लिखता है। बल्कि इसलिए कि वह समाज और शासन के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु का काम करता है।
आज कुछ लोग यह सोचते हैं। कि पत्रकारों के समूह में रहने से आखिर हासिल क्या होगा।
कुछ लोग यह भी कहते हैं। कि जब जरूरत पड़ेगी, तब देख लिया जाएगा।
लेकिन जिंदगी हमेशा हमारी सुविधा के हिसाब से नहीं चलती।
जिस दिन आपकी आवाज किसी कार्यालय की चौखट पर पहुंचकर लौट आएगी,
जिस दिन आपकी शिकायत की फाइल महीनों तक धूल खाएगी,
जिस दिन आपके साथ अन्याय होगा और आपकी बात सुनने वाला कोई नहीं होगा। तब
उस दिन शायद आपको एक खबर, एक पत्रकार और एक कलम की ताकत समझ आएगी।
पत्रकार किसी व्यक्ति की आवाज को केवल कागज पर नहीं उतारता, बल्कि उसे समाज के सामने रखता है। कभी-कभी एक छोटी-सी खबर किसी बड़े अधिकारी को कार्रवाई के लिए मजबूर कर देती है। कभी किसी गरीब की पीड़ा शासन तक पहुंचती है। कभी किसी पीड़ित परिवार को न्याय की उम्मीद मिलती है।
यही है। पत्रकारिता की असली ताकत है।
इसलिए पत्रकारों का मंच कोई मनोरंजन का स्थान नहीं है। यह कोई ट्रेडिंग, रील या गॉसिप ग्रुप नहीं है। जिसकी उपयोगिता केवल समय बिताने तक सीमित हो।
यह वह मंच है। जहां सूचनाओं का आदान-प्रदान होता है। खबरों की जानकारी साझा होती है। पत्रकार एक-दूसरे से जुड़ते हैं। और समाज की आवाज को मजबूती मिलती है।
किसी पत्रकार समूह को छोटा समझना वास्तव में पत्रकारिता की सामूहिक शक्ति को छोटा समझना है।
याद रखिए—एक अकेली कलम खबर लिख सकती है। लेकिन संगठित कलमें बदलाव की आवाज बन सकती हैं।
आज यदि किसी पत्रकार साथी को कोई परेशानी नहीं है। तो इसका मतलब यह नहीं कि भविष्य में भी जरूरत नहीं पड़ेगी। परिस्थितियां किसी को बताकर नहीं आतीं।
आज आप किसी की खबर लिख रहे हैं।
कल किसी को आपकी खबर लिखनी पड़ सकती है।
आज आप किसी पीड़ित की आवाज बन रहे हैं।
कल हो सकता है। आपकी आवाज को किसी पत्रकार की जरूरत पड़े।
इसलिए पत्रकारों के बीच एकता केवल संगठन की मजबूती नहीं है। बल्कि यह एक-दूसरे के सम्मान, सहयोग और अस्तित्व की सुरक्षा का विषय भी है।
जो साथी किसी पत्रकार समूह से बाहर निकलते समय यह सोचते हैं। कि “मेरे जाने से क्या फर्क पड़ेगा। , उनसे सिर्फ इतना कहना है।
फर्क तब समझ में आता है। जब आपकी आवाज अकेली पड़ जाती है।
पत्रकारिता किसी एक व्यक्ति की जागीर नहीं है। यह उन तमाम कलमकारों की जिम्मेदारी है। जो सच को सच और गलत को गलत कहने का साहस रखते हैं।
हमारा उद्देश्य किसी से लड़ना नहीं, बल्कि सच्चाई के पक्ष में खड़ा होना है।
हमारा उद्देश्य किसी को नीचा दिखाना नहीं, बल्कि पीड़ित की आवाज को ऊपर उठाना है।
हमारा उद्देश्य किसी के खिलाफ खड़ा होना नहीं, बल्कि अन्याय के खिलाफ खड़ा होना है।
और यही पत्रकारिता की पहचान है।
कलम बिकनी नहीं चाहिए,
कलम झुकनी नहीं चाहिए,
कलम डरनी नहीं चाहिए।
क्योंकि जिस दिन कलम डर गई, उस दिन समाज की बहुत-सी आवाजें हमेशा के लिए खामोश हो जाएंगी।
आइए, पत्रकारिता को केवल अपना पेशा न समझें। इसे अपनी जिम्मेदारी समझें। अपने साथी पत्रकार के सुख-दुःख में साथ खड़े हों। सूचनाओं का आदान-प्रदान करें। एक-दूसरे का सम्मान करें और सबसे बढ़कर अपनी कलम की गरिमा को बनाए रखें।
क्योंकि
जब आवाजें खामोश हो जाती हैं। तब कलम बोलती है।
जब न्याय की राह बंद दिखाई देती है। तब एक खबर रास्ता बनाती है।
और जब कोई अकेला पड़ जाता है। तब पत्रकारिता उसकी आवाज बनती है।
कलम मेरी जिंदगी है।
कलम मेरे इंसाफ का घर है।
कलम मेरी बंदगी है।
और कलम ही मेरी पहचान है।
जुनून है। सच दिखाने का,
संकल्प है। सच लिखने का,
और वादा है। आपकी आवाज को आपकी आवाज बनकर जन-जन तक पहुंचाने का।










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