के.बी.पी.जी. कॉलेज, मिर्ज़ापुर और अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान, लखनऊ (संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश शासन) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित सात दिवसीय ‘बोधि-पथ’ कार्यशाला के दूसरे दिन पर्यावरण और बौद्ध दर्शन पर गंभीर मंथन हुआ। “सतत विकास एवं पर्यावरण संरक्षण में बौद्ध दृष्टिकोण” विषय पर केंद्रित इस कार्यशाला के मुख्य वक्ता मध्यकालीन इतिहास विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर अमिताभ तिवारी रहे।
प्रोफेसर अमिताभ तिवारी ने अपने संबोधन में कहा कि बौद्ध दर्शन मानव को प्रकृति का स्वामी नहीं, बल्कि उसका एक अभिन्न हिस्सा मानता है। उन्होंने वर्तमान विकास मॉडल पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि बौद्ध विचार आधुनिक भौतिकवादी और अत्यधिक उपभोग-आधारित जीवनशैली की आलोचना करता है। इसके विपरीत, यह दर्शन हमें एक संतुलित, सचेत और मर्यादित जीवन शैली अपनाने की प्रेरणा देता है।
कार्यक्रम के विशिष्ट वक्ता और प्रबोधिनी संस्था के संस्थापक निदेशक विभूति कुमार मिश्रा ने कहा कि बौद्ध दर्शन में प्रकृति और मानव का संबंध परस्पर निर्भरता, सह-अस्तित्व और गहरे नैतिक जुड़ाव पर आधारित है। यदि हम प्रकृति को नुकसान पहुंचाएंगे, तो मानव अस्तित्व भी सुरक्षित नहीं रहेगा।
सत्र की अध्यक्षता करते हुए शिक्षा संकाय के अध्यक्ष प्रोफेसर भवभूति मिश्रा ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि बुद्ध का संदेश पूरी तरह प्रकृति के संरक्षण, अंतर्निर्भरता और पर्यावरण संतुलन पर टिका हुआ है। वर्तमान वैश्विक संकटों का समाधान बौद्ध जीवन दर्शन में समाहित है।
कार्यक्रम का सफल संचालन कार्यशाला के संयोजक डॉ. कुलदीप पांडेय ने किया। सत्र के अंत में प्रोफेसर नम्रता मिश्रा ने सभी अतिथियों, वक्ताओं और आगंतुकों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया।
इस अवसर पर संगीत विभाग की अध्यक्ष प्रोफेसर अर्चना पांडेय, प्रोफेसर नम्रता मिश्रा, डॉ. करनैल सिंह, डॉ. रविंद्र प्रताप सिंह, डॉ. अमोद कुमार ,डॉ. सतीश चंद्र वर्मा सहित महाविद्यालय के शिक्षक, कर्मचारी और शिक्षा संकाय के भारी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।









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