गरीब की उम्मीदों का गला घोंटती व्यवस्था पर उठे सवाल, देश की आत्मा को झकझोर देने वाला लेख बना जनचर्चा का विषय

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नई दिल्ली/जौनपुर।

देश की न्याय व्यवस्था, सत्ता के अहंकार और गरीबों के टूटते विश्वास पर लिखा गया एक मार्मिक और बेबाक लेख इन दिनों सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक चर्चा का केंद्र बन गया है।

बकरी उम्मीद से, शेर की अदालत में शीर्षक से लिखे गए इस लेख ने उन लाखों गरीब परिवारों के दर्द को शब्द दे दिए हैं। जिन्हें वर्षों तक न्याय के नाम पर सिर्फ तारीखें, अपमान और इंतजार मिला।

लेख में जिस तरह से व्यवस्था की खामियां न्याय में बढ़ती असमानता और सत्ता के दोहरे चरित्र को उजागर किया गया है। उसने आम आदमी के भीतर दबे आक्रोश को बाहर ला दिया है।

हर वह गरीब, किसान, बेरोजगार युवा और पीड़ित परिवार इस लेख में अपनी कहानी देख रहा है। जिसे कभी सिस्टम ने कुचल दिया, कभी नेताओं ने इस्तेमाल कर छोड़ दिया, और कभी न्याय के नाम पर भटकने पर मजबूर कर दिया।

लेख का सबसे दर्दनाक पहलू वह है। जहां एक गरीब आदमी की पीढ़ियां अदालत की चौखट पर खत्म हो जाती हैं। लेकिन न्याय नहीं मिलता।

जिस जमीन को बचाने के लिए पिता अदालत जाता है। उसी मुकदमे को बेटा और फिर पोता लड़ता रहता है।

उधर कब्जेदार उसी जमीन पर आलीशान इमारत खड़ी कर देता है। और गरीब परिवार सड़क पर आ जाता है।

लेख में यह भी सवाल उठाया गया कि अगर व्यवस्था में फर्जी लोग हैं। तो उन्हें पैदा किसने किया।

अगर अदालतों में वर्षों मुकदमे लटकते हैं। तो उसका जिम्मेदार कौन है।
अगर गरीब आदमी न्याय के इंतजार में मर जाता है। तो आखिर जवाबदेह कौन होगा।

इन सवालों ने उन राजनीतिक दलों और नेताओं की अंतरात्मा को भी झकझोर कर रख दिया है। जो चुनाव के समय गरीबों के घर जाकर आंसू बहाते हैं। लेकिन सत्ता में पहुंचते ही उन्हीं गरीबों की आवाज दबा देते हैं।

लेख में यह कटाक्ष भी लोगों के दिल में उतर गया कि
गरिमा सवाल पूछने से नहीं गिरती, गरिमा गलत फैसलों और अहंकार से गिरती है।

आज देश का हर एक गरीब पूछ रहा है। कि
क्या न्याय सिर्फ अमीरों के लिए बचा है।
क्या गरीब की जिंदगी की कोई कीमत नहीं है।
क्या पहुंच और पैसे वालों के लिए कानून अलग बना है। और आम आदमी के लिए अलग है।

सोशल मीडिया पर हजारों लोग इस लेख को साझा करते हुए लिख रहे हैं। कि यह सिर्फ एक लेख नहीं, बल्कि उस गरीब भारत की चीख है। जिसे सुनने वाला कोई नहीं बचा।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है। कि इस प्रकार की बेबाक आवाजें उन नेताओं के चेहरे से नकाब हटाने का काम कर रही हैं।‌ जो गरीबों के भरोसे राजनीति तो करते हैं। लेकिन उनके दर्द पर कभी ईमानदारी से खड़े नहीं होते हैं।‌

आज जरूरत इस बात की है। कि सत्ता, न्याय और राजनीति के ऊंचे सिंहासनों पर बैठे लोग गरीब की आह को समझें।

क्योंकि जिस दिन गरीब का भरोसा पूरी तरह टूट गया, उस दिन लोकतंत्र सिर्फ किताबों में रह जाएगा।

गरीब की बद्दुआ जब निकलती है। तो महलों की नींव तक हिल जाती है।

रिपोर्ट – जगदीश शुक्ला

 

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