आज देश का आम इंसान एक ऐसे दौर से गुजर रहा है,जहाँ मेहनत करने वाला इंसान सबसे ज्यादा परेशान है।

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आज देश का आम इंसान एक ऐसे दौर से गुजर रहा है,
जहाँ मेहनत करने वाला इंसान सबसे ज्यादा परेशान है।

दिन-प्रतिदिन बढ़ती महंगाई ने गरीब और मध्यम वर्ग की कमर तोड़ दी है।
रोजमर्रा की चीज़ें — आटा, दाल, तेल, गैस, बिजली, दवाइयाँ — सब आम आदमी की पहुँच से बाहर होती जा रही हैं।
लेकिन दुख की बात ये है कि
जिस गरीब ने मेहनत करके इस देश को खड़ा किया,
आज वही दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष कर रहा है।

गरीब और गरीब होता जा रहा है,
और अमीर पहले से ज्यादा अमीर।
कुछ लोगों के महलों की ऊँचाई बढ़ रही है,
तो दूसरी तरफ मजदूर का चूल्हा ठंडा पड़ता जा रहा है।
यही आज के सिस्टम की सबसे बड़ी सच्चाई है।

चारों तरफ बेरोजगारी का ऐसा माहौल है कि
पढ़ा-लिखा युवा डिग्रियाँ लेकर दर-दर भटक रहा है।
न नौकरी मिल रही है,
न रोजगार का कोई स्थायी साधन।
जिस युवा के हाथों में देश का भविष्य होना चाहिए था,
आज उसके हाथों में बेरोजगारी की मजबूरी है।

किसान, जो धरती माँ का सीना चीरकर अन्न पैदा करता है,
आज सबसे ज्यादा दुखी और अपमानित है।
मंडियों में किसानों की फसलें धूल खा रही हैं,
फसल का सही भाव नहीं मिल रहा।
किसान महीनों मेहनत करता है,
कर्ज लेकर बीज डालता है,
दिन-रात खेत में पसीना बहाता है,
लेकिन जब फसल बिकने का समय आता है
तो मंडियों में वही किसान लुट जाता है।

कहीं बारदाना नहीं,
कहीं खरीद बंद,
कहीं भुगतान अटका हुआ,
तो कहीं दलालों और भ्रष्ट अधिकारियों का खेल।
आखिर किसान जाए तो जाए कहाँ?

एक तरफ मौसम की मार,
दूसरी तरफ सरकारों की अनदेखी,
ऊपर से बैंक का कर्ज और घर की जिम्मेदारियाँ —
इन सबके बीच किसान टूटता जा रहा है।
यही कारण है कि आज किसान आत्महत्या करने तक को मजबूर हो रहा है।
ये सिर्फ एक किसान की मौत नहीं होती,
ये उस सिस्टम की हार होती है
जो अन्नदाता को सम्मान और सुरक्षा नहीं दे पाया।

मज़दूरों की हालत भी किसी से छुपी नहीं है।
दिनभर मेहनत करने वाला मजदूर
आज भी अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा और अच्छा भविष्य देने के लिए संघर्ष कर रहा है।
मेहनत उसकी,
फायदा किसी और का।
पसीना उसका,
लेकिन सुख-सुविधाएँ किसी और की।

आज भ्रष्टाचार इस सिस्टम की नस-नस में फैल चुका है।
गरीब आदमी सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटता रहता है,
लेकिन बिना पैसे और सिफारिश के उसकी सुनवाई नहीं होती।
जनता परेशान है,
लेकिन कुर्सियों पर बैठे लोग सिर्फ भाषणों में व्यस्त हैं।

सवाल ये नहीं कि देश आगे बढ़ रहा है या नहीं,
सवाल ये है कि
क्या इस देश का किसान, मजदूर और गरीब इंसान भी आगे बढ़ रहा है?
अगर अन्नदाता रो रहा है,
अगर युवा बेरोजगार है,
अगर मजदूर भूखा है,
तो फिर विकास के बड़े-बड़े दावे किस काम के?

आज जरूरत है आवाज उठाने की,
एकजुट होने की,
अन्याय के खिलाफ खड़े होने की।
क्योंकि जब तक किसान, मजदूर और आम जनता अपनी ताकत नहीं पहचानेंगे,
तब तक ये भ्रष्ट सिस्टम उन्हें यूँ ही कुचलता रहेगा।

याद रखो —

जिस दिन मेहनतकश जनता जाग गई,
उस दिन सत्ता के बड़े-बड़े महल भी हिल जाएंगे। ✊🚩

रिपोर्ट – जगदीश शुक्ला

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सबसे ज्यादा पड़ गई