विंध्याचल धाम : आस्था के नाम पर अव्यवस्था कब तक?

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मिर्जापुर

अनिकेत शर्मा के कलम से विंध्यवासिनी देवी मंदिर में माता के दर्शन के लिए देश के कोने-कोने से श्रद्धालु आते हैं। कोई अपनी मनोकामना लेकर आता है, तो कोई वर्षों पुरानी आस्था निभाने। लेकिन जिस दरबार में श्रद्धा, शांति और भक्ति का अनुभव होना चाहिए, वहां आज आम श्रद्धालु अव्यवस्था, दुर्व्यवहार और भेदभाव का सामना करने को मजबूर है।

माँ की महिमा अपार है, तभी लाखों लोग कठिन यात्रा करके दरबार तक पहुँचते हैं। मगर दुख की बात यह है कि मंदिर परिसर में कुछ मनबढ़ पंडों और व्यवस्था में लगे लोगों का व्यवहार लगातार सवालों के घेरे में है। आए दिन सोशल मीडिया पर विवाद, मारपीट, अभद्रता और जबरन दक्षिणा मांगने की घटनाएँ सामने आती रहती हैं। प्रशासन ने सुरक्षा और व्यवस्था के बड़े-बड़े दावे किए, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी श्रद्धालुओं को परेशान कर रही है।

हाल ही में मंदिर परिसर में एक ऐसा दृश्य देखने को मिला जिसने इंसानियत पर सवाल खड़े कर दिए। एक व्यक्ति अपनी गोद में छोटे बच्चे को लेकर लाइन में खड़ा था। बच्चा लगातार रो रहा था। पिता बार-बार ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी से विनती करता रहा, लेकिन बिना नेम प्लेट की वर्दी पहने साहब अपनी “ड्यूटी” निभाने में इतने व्यस्त थे कि उन्होंने उस आम श्रद्धालु को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। शायद इसलिए क्योंकि वह कोई VIP नहीं था।

यही सबसे बड़ा सवाल है — क्या माता का दरबार अब सिर्फ VIP लोगों के लिए रह गया है?

आम श्रद्धालुओं के लिए गर्भगृह में प्रवेश निषेध है, लेकिन नेता, मंत्री, विधायक, कलाकार और प्रभावशाली लोगों के लिए सारे नियम पल भर में बदल जाते हैं। उनके लिए लाइनें रुक जाती हैं, सुरक्षा घेरा बन जाता है और प्रशासन उनके आगे-पीछे घूमता नजर आता है। मानो नियम सिर्फ आम जनता के लिए बने हों। क्या आस्था में भी अब वर्गभेद होगा?

अगर बात करें मंदिर परिसर में मौजूद पड़ावों और तथाकथित “विद्वानों” की, तो स्थिति और भी चिंताजनक है। माँ के दरबार को कुछ लोगों ने खुलेआम व्यापार का केंद्र बना दिया है। दक्षिणा न देने पर श्रद्धालुओं को ताने सुनने पड़ते हैं, बद्दुआ तक दी जाती है। कई बार तो जेब तक टटोली जाती है और कहा जाता है — “माई के दर्शन करने खाली हाथ चले आए?”

आखिर दर्शन का अर्थ क्या सिर्फ पैसा रह गया है?

श्रद्धालु अपनी श्रद्धा से जो चढ़ाना चाहे, वह उसकी इच्छा होनी चाहिए। लेकिन यहाँ तो हर कदम पर दक्षिणा की मांग खड़ी मिलती है। चाहे कालीखोह मंदिर हो, अष्टभुजा देवी मंदिर हो, कुंड हो या कोई अन्य धार्मिक स्थल — हर जगह पैसे का दबाव और अभद्र व्यवहार श्रद्धालुओं की आस्था को आहत कर रहा है।

सबसे दुखद बात यह है कि मंदिर परिसर में ही कुछ लोग खुलेआम पान-गुटखा खाते दिखाई देते हैं। विरोध करने पर झगड़ा, गाली-गलौज और मारपीट तक की नौबत आ जाती है। सोशल मीडिया पर आए दिन ऐसी घटनाओं के वीडियो वायरल होते रहते हैं। जो व्यक्ति श्रद्धा लेकर जाता है, वह कई बार क्रोध और निराशा लेकर वापस लौटता है।

विंध्याचल धाम केवल एक मंदिर नहीं, करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। यहाँ आने वाला हर श्रद्धालु सम्मान और सुगम दर्शन का अधिकार रखता है। लेकिन जब व्यवस्था VIP संस्कृति, जबरन वसूली और दुर्व्यवहार के बोझ तले दब जाए, तब सवाल उठना स्वाभाविक है।

जरूरत इस बात की है कि प्रशासन सिर्फ दिखावे की सुरक्षा व्यवस्था न करे, बल्कि सख्ती से ऐसे लोगों पर कार्रवाई करे जो माँ के दरबार की गरिमा को ठेस पहुँचा रहे हैं। मंदिर परिसर में पारदर्शी व्यवस्था, समान दर्शन व्यवस्था और श्रद्धालुओं के सम्मान को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

क्योंकि माँ के दरबार में कोई VIP नहीं होता…
वहाँ सब सिर्फ श्रद्धालु होते हैं।

 

रिपोर्ट – अनिकेत शर्मा

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