> “अच्छे दिन आ गए? ज़रा गरीब की थाली में झांकिए”

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“प्रधानमंत्री जी, तीसरी पारी मुबारक हो।
पर आपकी किस्मत का सिक्का उछलते-उछलते गरीब की थाली में नहीं गिरा। वो आज भी खाली है।

महंगाई ऐसी कि राशन कार्ड वाले भी करोड़पति लगते हैं। जिसके पास झोपड़ी नहीं, वो फुटपाथ पर आधार कार्ड तकिया बनाकर सोता है। और जिसके पास 4 मंजिला कोठी है, वो लाइन में लगकर ‘गरीब’ का राशन ले जाता है। सरकारी मुलाजिम आंख बंद करके ठप्पा मार देता है।

बनारस में 100 करोड़ की सौगात आई। ढोल-नगाड़े वाले ‘वाहवाही’ लूटकर चले गए। उनके लिए यही ‘अच्छे दिन’ हैं। पर ढोल की आवाज में उस मजदूर की भूख का रोना दब गया जो फैक्ट्री न होने से बेरोजगार है।

नेता जी, चुनाव से पहले आप मदारी नहीं, सेवक बनते हो। घर-घर जाकर वोट की भीख मांगते हो, कसम खाते हो। कुर्सी मिलते ही स्क्रिप्ट बदल जाती है। फिर शुरू होता है फिल्मी सीन: जाति का तड़का, गाली का डायलॉग, और क्लाइमैक्स में पीड़ित के घर जाकर आंसू पोछने का ड्रामा। वाह!

इस देवभूमि में कण-कण में भगवान हैं। पर लगता है नेताओं के कानों में जनता की आवाज नहीं पहुंचती। विदेशी यहां संस्कार लेने आते हैं, और ‘घर के भेदियों’ का तमाशा देखकर वापस जाते हैं।

आपके डमरू पर 40% नाचेंगे, मान लिया। पर बाकी 60% अब सवाल पूछ रहा है। वो बुद्धिजीवी है, अंधभक्त नहीं।

मांग छोटी सी है: जाति-धर्म का डमरू बंद करो, फैक्ट्री का सायरन बजाओ। जिस दिन हर हाथ को काम मिलेगा, उस दिन मान लेंगे – हां, अच्छे दिन आ गए।

वरना इतिहास आपकी आने वाली पीढ़ी से सवाल पूछेगा। और तब कोई डमरू काम नहीं आएगा।

जय हिंद। सवाल जिंदा है।”

रिपोर्ट – जगदीश शुक्ला

 

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