वाराणसी, 16 अप्रैल :
पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम के बीएचयू स्थित 33/11 केवी पावर हाउस में हुई सिलसिलेवार चोरियों ने अब पूरे विभाग को कठघरे में खड़ा कर दिया है। मामला सिर्फ चोरी तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि इसमें साक्ष्यों को मिटाने, अंदरूनी मिलीभगत और जिम्मेदार अधिकारियों की संदिग्ध भूमिका की परतें भी खुलने लगी हैं।
🚨 चोरी के बाद ‘रिटर्न गिफ्ट’! पुलिस दबाव में वापस आई बाइक
घटना में नया मोड़ तब आया जब 13 अप्रैल को पीड़ित जेई सत्य प्रकाश ने चितईपुर थाने में शिकायत दर्ज कराई। पुलिस की सक्रियता बढ़ते ही 26 मार्च से गायब बाइक 15 अप्रैल की रात रहस्यमय तरीके से पावर हाउस परिसर में ही छोड़ दी गई। यह सवाल खड़ा होता है कि आखिर चोर इतने बेखौफ कैसे हैं कि पुलिस केस के बाद भी सरकारी परिसर में घुसकर सामान वापस कर रहे हैं?
🔍 क्या अंदर से मिल रहा था ‘ग्रीन सिग्नल’?
सूत्रों की मानें तो बिना अंदरूनी मदद के यह संभव नहीं। संविदाकर्मी अश्वनी और कुछ बाहरी युवकों पर उंगलियां उठ रही हैं, जो कथित तौर पर पावर हाउस को अपनी ‘जागीर’ समझ बैठे हैं।

🎥 CCTV बना ‘मूक गवाह’ या ‘मिटाया गया सच’?
सबसे चौंकाने वाला पहलू है CCTV फुटेज का गायब होना। जब-जब चोरी हुई, तब-तब कैमरे बंद या ‘अंधे’ हो गए। बताया जा रहा है कि कैमरों का एक्सेस एक दागी संविदाकर्मी को दिया गया था — जो सीधे-सीधे सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है। यह महज तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि ‘डिजिटल मर्डर’ जैसा गंभीर मामला माना जा रहा है।
👀 ड्यूटी पर मौजूद कर्मियों की चुप्पी संदिग्ध
घटना के दौरान ड्यूटी पर तैनात SSO राकेश कुमार अंबेडकर, मनोज पाल और सूर्य प्रकाश गौतम की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। क्या इन्हें कुछ पता नहीं था, या फिर किसी ‘ऊपरी दबाव’ में सबकुछ नजरअंदाज किया गया?
🏢 मुख्य अभियंता की ‘करीबी पोस्टिंग’ पर उठे सवाल
विभाग में चर्चा है कि मुख्य अभियंता वाराणसी वर्षों से एक ही क्षेत्र में जमे हुए हैं। अधीक्षण अभियंता से प्रमोशन के बाद भी उनकी पोस्टिंग महज 50 मीटर के दायरे में रहना, कई सवाल खड़े करता है। क्या इसी ‘स्थानीय पकड़’ के चलते नियंत्रण कमजोर हुआ और पावर हाउस अराजक तत्वों का अड्डा बन गया?
⚖️ अब सबकी नजर एमडी पर
पूरा मामला अब चितईपुर थाने में दर्ज तहरीर और संभावित फोरेंसिक जांच पर टिका है।
अगर DVR की जांच होती है, तो कई बड़े चेहरों का पर्दाफाश हो सकता है।
बड़े सवाल:
* क्या लंबे समय से जमे अधिकारियों की भूमिका की जांच होगी?
* क्या संविदाकर्मियों के इस कथित गिरोह पर कार्रवाई होगी?
* क्या विभाग अपनी साख बचा पाएगा?
फिलहाल, BHU पावर हाउस की यह कहानी बिजली आपूर्ति से ज्यादा ‘सिस्टम की अंधेरी सच्चाई’ उजागर कर रही है।










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