वाराणसी:
साहित्य अकादमी द्वारा मैथिली भाषा के अंतर्गत प्रतिष्ठित सम्मान के लिए वाराणसी निवासी साहित्यकार नेहा झा मणि की कृति “बनारस आ हम” का चयन किया गया है। इस उपलब्धि से न केवल लेखिका बल्कि काशी और मिथिला की सांस्कृतिक विरासत भी गौरवान्वित हुई है। सम्मान समारोह में अपने अभिभाषण के दौरान नेहा झा मणि ने भावुकता और विनम्रता के साथ अपने साहित्यिक सफर को साझा किया।
उन्होंने अपने संबोधन की शुरुआत “जय बुढ़िया माय, जयतु मैथिली” के उद्घोष के साथ करते हुए उपस्थित सभी विद्वानों, साहित्यकारों और साहित्य प्रेमियों को प्रणाम किया। उन्होंने साहित्य अकादमी, मैथिली भाषा के संयोजकों, ज्यूरी सदस्यों एवं चयन समिति का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उनके प्रोत्साहन से ही उन्हें इस मंच पर आने का अवसर प्राप्त हुआ है।
नेहा झा मणि ने अपने जीवन के संघर्षों और पारिवारिक पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए बताया कि उनके पूर्वज शक्ति उपासक रहे हैं और परिवार में महिलाओं की शिक्षा व सशक्तिकरण की मजबूत परंपरा रही है। उनके पिता ने कठिन परिस्थितियों में भी बच्चों की शिक्षा को प्राथमिकता दी, जिसका परिणाम है कि आज वह इस मुकाम तक पहुंच पाई हैं।
उन्होंने बताया कि लेखन की शुरुआत उन्होंने हिंदी से की थी, लेकिन काशी में रहने के दौरान उन्हें अपनी जड़ों और मातृभूमि मिथिला की यादें बार-बार उद्वेलित करती रहीं। इसी भावनात्मक जुड़ाव ने उन्हें मैथिली भाषा में लेखन के लिए प्रेरित किया। उन्होंने मैथिली के प्रसिद्ध साहित्यकारों जैसे राजकमल चौधरी, हरिमोहन झा और यात्री जी के साहित्य से प्रेरणा ली।
उनका पहला मैथिली कविता संग्रह “अँगनामे अकास” वर्ष 2021 में प्रकाशित हुआ, जिसे 2024 में “ज्योत्सना सम्मान” से नवाजा गया। इस उपलब्धि ने उन्हें मातृभाषा के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का एहसास कराया। इसके बाद उन्होंने अपने अनुभवों और संवेदनाओं को और विस्तार देते हुए “बनारस आ हम” की रचना की, जिसमें मिथिला और काशी की सांस्कृतिक धारा, परंपराएं और स्त्री चेतना का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है।
नेहा झा मणि ने अपने वक्तव्य में कहा कि किसी शहर पर लिखी गई
कृति का सम्मान केवल लेखक का नहीं, बल्कि उस शहर और भाषा का भी सम्मान होता है। उन्होंने कहा कि पिछले दस वर्षों में उन्होंने बनारस को जितना समझा है, वही उनकी रचनाओं में परिलक्षित होता है। अपने संबोधन के अंत में उन्होंने अपने माता-पिता, परिवार, पति और बेटी के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उनके सहयोग और त्याग के बिना यह उपलब्धि संभव नहीं थी। साथ ही उन्होंने यह संकल्प लिया कि वह आगे भी अपनी मातृभाषा और साहित्य के प्रति ईमानदारी से कार्य करती रहेंगी। यह सम्मान काशी और मिथिला के सांस्कृतिक सेतु को और मजबूत करने के साथ-साथ मैथिली साहित्य को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।











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