प्रयागराज:
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के सभी रिमांड मजिस्ट्रेटों को स्थापित विधिक सिद्धांतों का कड़ाई से अनुपालन करने का महत्वपूर्ण निर्देश दिया है. न्यायमूर्ति सिद्धार्थ एवं न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने यह आदेश मोहम्मद हारून की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई के दौरान पारित किया. अदालत ने स्पष्ट किया कि रिमांड मजिस्ट्रेट से यह अपेक्षा की जाती है कि वह पुलिस द्वारा मांगे गए रिमांड की वैधानिकता पर गहराई से विचार करे. कोर्ट ने रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया है
कि इस आदेश की प्रति प्रदेश के सभी जिला जजों को भेजी जाए ताकि इसका जमीनी स्तर पर पालन सुनिश्चित हो सके. पीलीभीत के मामले में सख्त टिप्पणी: यह प्रकरण पीलीभीत के एक रिमांड मजिस्ट्रेट द्वारा दिए गए गलत रिमांड आदेश के बाद संज्ञान में आया है. हाईकोर्ट ने पूर्व में इस मामले पर कड़ा रुख अपनाते हुए संबंधित मजिस्ट्रेट से स्पष्टीकरण मांगा था और एसपी पीलीभीत को विवेचक के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई के निर्देश दिए थे. अदालत ने मजिस्ट्रेट के उस आदेश को भी निरस्त कर दिया था जिसे विधि सम्मत नहीं पाया गया था. इस आदेश के बाद पुलिस विभाग और न्यायिक हल्कों में हड़कंप मच गया था और विवेचना की गुणवत्ता पर सवाल उठे थे.
दोषी विवेचक निलंबित, विभागीय जांच शुरू: कोर्ट के आदेश के अनुपालन में एसपी पीलीभीत ने हलफनामा दाखिल कर बताया कि दोषी विवेचक/निरीक्षक को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है. संबंधित अधिकारी को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है और उनके विरुद्ध विभागीय कार्यवाही की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है. वहीं, संबंधित रिमांड मजिस्ट्रेट ने भी अपनी न्यायिक चूक को स्वीकार करते हुए अदालत के समक्ष स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया है. मजिस्ट्रेट ने भविष्य में रिमांड आदेश पारित करते समय ऐसी गलतियों की पुनरावृत्ति न करने का आश्वासन दिया है.
न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता पर जोर: हाईकोर्ट का यह निर्देश प्रदेश की निचली अदालतों में रिमांड की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और न्यायसंगत बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है. अदालत ने दोहराया कि रिमांड केवल पुलिस की मांग पर यंत्रवत तरीके से नहीं दिया जाना चाहिए, बल्कि इसके पीछे ठोस कानूनी आधार होना अनिवार्य है. याचिकाकर्ता मोहम्मद हारून की ओर से अधिवक्ता गोपाल कृष्ण दीक्षित और अनुराग त्रिपाठी ने प्रभावी ढंग से पक्ष रखते हुए नियमों की अनदेखी को उजागर किया था. इस फैसले से अब प्रदेश भर के रिमांड मजिस्ट्रेटों को रिमांड अर्जियों पर विचार करते समय अधिक सतर्कता बरतनी होगी।










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