नई दिल्ली:
ईरान द्वारा विकसित शहेद ड्रोन आज के युद्ध में एक बड़ा खतरा बनकर उभरे हैं. कम लागत में तैयार होने वाले ये ड्रोन बेहद खतरनाक साबित हो रहे हैं और मिडिल ईस्ट जैसे संघर्षों में भारी नुकसान पहुंचा चुके हैं. इनकी खासियत यह है कि ये साधारण दिखने के बावजूद एडवांस तकनीक से लैस होते हैं जिससे इन्हें रोकना आसान नहीं होता.
बिना GPS के भी निशाना साधने की क्षमता:
शहेद ड्रोन आमतौर पर उड़ान की शुरुआत में GPS से अपनी लोकेशन तय करते हैं लेकिन उसके बाद अक्सर GPS बंद कर देते हैं. इसकी जगह ये इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम का इस्तेमाल करते हैं जिसमें जाइरोस्कोप के जरिए दिशा, गति और स्थिति को ट्रैक किया जाता है. इस तकनीक का फायदा यह है कि दुश्मन द्वारा किए जाने वाले GPS जामिंग से ये बच जाते हैं. यानी अगर कोई देश GPS सिग्नल को बाधित कर दे तब भी ये ड्रोन अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहते हैं.
टारगेट के पास पहुंचकर फिर एक्टिव होता है GPS:
कई मामलों में ये ड्रोन लक्ष्य के करीब पहुंचने पर दोबारा GPS चालू कर देते हैं ताकि आखिरी समय में सटीक हमला किया जा सके. हालांकि इनकी सटीकता हमेशा परफेक्ट नहीं होती लेकिन हमला करने के लिए पर्याप्त होती है.
एंटी-जैमिंग तकनीक बनाती है और खतरनाक:
शहेद ड्रोन में एंटी-जैमिंग सिस्टम भी लगाया गया है जो दुश्मन के सिग्नल को ब्लॉक कर देता है और जरूरी GPS सिग्नल को बनाए रखता है. यही वजह है कि इन्हें रोकने के लिए सिर्फ साधारण तकनीक काफी नहीं होती बल्कि एडवांस इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम की जरूरत पड़ती है.
हल्के और रडार से छिपने वाले डिजाइन:
इन ड्रोन को प्लास्टिक और फाइबरग्लास जैसे हल्के और रडार-एब्जॉर्ब करने वाले मटेरियल से बनाया जाता है. इनके छोटे आकार और कम ऊंचाई पर उड़ान भरने की क्षमता इन्हें एयर डिफेंस सिस्टम की नजर से बचा देती है.
कई नेविगेशन सिस्टम का इस्तेमाल:
कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि ईरान अपने ड्रोन में एक से ज्यादा नेविगेशन सिस्टम का इस्तेमाल करता है. इसमें चीन का BeiDou और रूस का GLONASS सिस्टम शामिल हो सकता है. इससे ड्रोन को जामिंग से बचना और आसान हो जाता है.
कैसे किया जाता है इनका बचाव:
इन ड्रोन से बचाव के लिए सेनाएं मिसाइल, गन और इंटरसेप्टर ड्रोन का इस्तेमाल करती हैं. इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक जामिंग और स्पूफिंग तकनीक भी अपनाई जाती है जिसमें ड्रोन के नेविगेशन सिस्टम को भ्रमित कर उसका रास्ता बदल दिया जाता है. कई मामलों में इन दोनों तरीकों इलेक्ट्रॉनिक और पारंपरिक को साथ में इस्तेमाल किया जाता है ताकि ज्यादा असरदार सुरक्षा मिल सके.
रिपोर्ट – जगदीश शुक्ला










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