जब पत्रकार ही पत्रकार का साथ छोड़ दे, तो लोकतंत्र किसके सहारे खड़ा रहेगा

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देश की पत्रकारिता को झकझोर देने वाला बयान देते हुए राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा आयोग के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सुरेश कुमार शर्मा ने आज एक बड़ा सवाल खड़ा किया है। आख़िर देश में पत्रकार एकजुट क्यों नहीं हैं।उन्होंने कहा कि हर पत्रकार खुद को बड़ा साबित करने की होड़ में लगा है। लेकिन जब किसी पत्रकार साथी के साथ कोई अनहोनी होती है। तो सबसे पहले सवाल यह उठता है। यह हमारे संगठन का नहीं हैं। यह हमारे चैनल का नहीं हैं। यह तो फेसबुकिया पत्रकार है। ऐसे शब्द न केवल एक व्यक्ति का अपमान करते हैं ।बल्कि पूरे पत्रकार बिरादरी के आत्मसम्मान पर चोट करते हैं।

क्या हम भूल गए हैं। कि पत्रकार का असली परिचय उसका चैनल या संगठन नहीं, बल्कि उसकी कलम और उसकी निडरता है। वह पत्रकार, जो अपने परिवार की चिंता छोड़कर, अपनी जान जोखिम में डालकर किसी गरीब, असहाय और बेबस परिवार की आवाज बनता है। क्या उसका दर्द संगठन देखकर तय किया जाएगा।
शर्मा ने तीखे शब्दों में कहा कि जब तक पत्रकार आपसी ईर्ष्या, कटाक्ष और विभाजन की राजनीति से ऊपर नहीं उठेंगे, तब तक चौथा स्तंभ कमजोर ही होता जाएगा। आज हालात यह हैं। कि एकजुटता के अभाव में पत्रकारों की आवाज बिखर रही है। दूसरी ओर, समाज के अन्य वर्ग—जैसे वकील अपनी एकता के कारण मजबूत और प्रभावशाली बने हुए हैं।

उन्होंने चेतावनी दी कि यदि पत्रकार आज भी नहीं चेते, तो वह दिन दूर नहीं जब समाज उन्हें गंभीरता से लेना बंद कर देगा। जब पत्रकार ही पत्रकार की गरिमा की रक्षा नहीं करेगा, तो दूसरों से सम्मान की उम्मीद कैसे की जा सकती है।यह समय आत्ममंथन का है। यह समय संगठन या प्लेटफॉर्म की सीमाओं से बाहर निकलकर “पत्रकार” शब्द की गरिमा को बचाने का है। क्योंकि जब एक पत्रकार पर हमला होता है। तो वह किसी एक संस्था पर नहीं, बल्कि लोकतंत्र की नींव पर हमला होता है।

अब सवाल यह है। कि क्या देश का पत्रकार समाज जागेगा। क्या हम अपने छोटे-छोटे मतभेद भूलकर एक मंच पर खड़े होंगे। या फिर यूं ही बंटे रहकर अपने ही अस्तित्व को कमजोर करते रहेंगे।देश के हर पत्रकारों से अपील है। कि यह लड़ाई किसी एक की नहीं, हम सबकी है। एकजुटता ही हमारी असली ताकत है। समय आ गया है। कि हम साबित करें। कि पत्रकार बिकते नहीं, झुकते नहीं, और एक-दूसरे का साथ कभी छोड़ते नहीं।

 

रिपोर्ट सुरेश कुमार शर्मा

 

 

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