हिन्दू वैदिक परंपरा में विवाह के समय धान लावा का महत्व क्या है आइए जानते है महराज जी मुखारबिंद से

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विवाह में धान लावा परोसना या फेंकना, पति-पत्नी के अटूट बंधन, सुख-समृद्धि और वैवाहिक जीवन के खिलखिलाते रहने का प्रतीक है, जैसे धान गर्मी से लावा बनकर खिल उठता है, वैसे ही जोड़ा हर मुश्किल में साथ रहे;

यह एक प्राचीन रस्म है जो नए जीवन के लिए आशीर्वाद और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है, और यह सुनिश्चित करती है कि उनका रिश्ता मजबूत रहे और कभी अलग न हो.

मुख्य अर्थ और प्रतीकवाद:

अटूट बंधन: यह दर्शाता है कि जैसे लावा और धान अलग नहीं हो सकते, वैसे ही पति-पत्नी जीवन भर एक-दूसरे से जुड़े रहेंगे.

समृद्धि और सौभाग्य: लावा को शुभ माना जाता है और यह धन व सौभाग्य के आगमन का प्रतीक है, जिससे जोड़े के जीवन में खुशहाली आती है.

चुनौतियों में मजबूती: जिस तरह धान भूनकर लावा बनता है, उसी तरह यह रस्म बताती है कि वैवाहिक जीवन की कठिनाइयाँ उन्हें और मजबूत बनाएंगी. परिवारों का जुड़ाव: जब दूल्हे का भाई दुल्हन के हाथ पर लावा डालता है, तो यह दोनों परिवारों के बीच के संबंधों और समर्थन को दर्शाता है.

रस्म का तरीका:

अक्सर यह रस्म फेरों के दौरान या विदाई के समय होती है, जिसमें दुल्हन अपने पीछे धान के लावा फेंकती है.
कभी-कभी, भाई दूल्हे और दुल्हन के हाथों में लावा डालते हैं, और वे इसे अग्नि में अर्पित करते हैं या एक-दूसरे पर छिड़कते हैं.

यह रस्म भारतीय विवाहों का एक अभिन्न अंग है जो पारंपरिक मूल्यों और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना को दर्शाती है.

 

रिपोर्ट विजयलक्ष्मी तिवारी

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