चंदू चैंपियन के नाम से पूरी दुनियां में विख्यात भारत के पैरा के पहले दिव्यांग खिलाड़ी जिन्होंने 1972 में भारत के लिए पहला गोल्ड मेडल जीता था 82 वर्ष की अवस्था में दूसरी बार वाराणसी आए हैं पहली बार 1872 में गोल्ड मेडल जीतने के बाद उनका काशी में भव्य स्वागत हुआ था। वाराणसी एयरपोर्ट पर पहुंचने पर राज्य सलाहकार बोर्ड दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग के सदस्य डॉ उत्तम ओझा एवं प्रख्यात मनोचिकित्सक डॉ तुलसी दास जी ने काशी विश्वनाथ जी का स्मृति चिन्ह एवं अंगवस्त्र प्रदान कर बनारस किला में भव्य स्वागत किया।
पेटकर वाराणसी में काशी हिंदू विश्वविद्यालय में बौद्धिक दिव्यांग बच्चों के खेलकूद महोत्सव में बतौर मुख्य अतिथि भाग लेने के लिए काशी आए हैं। अपने स्वागत से अभिभूत पेटकर साहब ने कहा कि जितना मैंने सुना था उससे कहीं अधिक भाव और दिव्य अलौकिक नगरी काशी है। काशी आकर मुझे जो सुकून व आनंद की अनुभूति हुई है उसे मैं व्यक्त नहीं कर सकता है यह अनिवर्चनीय काशी मोक्ष की नगरी के साथ-साथ जीवन दायिनी है यहाँ आकर असीम ऊर्जा की अनुभूति हो रही है।
बाबा विश्वनाथ जी के दर्शन की इच्छा बचपन से थी जो आज 86 वर्ष की उम्र में पूरी हो रही है। डॉ उत्तम ओझा ने बताया कि कल बाबा विश्वनाथ का दर्शन करेंगे और खेलकूद महोत्सव में अतिथि के तौर पर सम्मिलित होकर 13 तारीख को पुणे वापस चले जाएंगे।











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