बीएचयू में अचिंत्य (कृत्रिम बुद्धिमत्ता विशेषांक) एवं विज्ञान गंगा के 13वें अंक का लोकार्पण; पूर्व इसरो अध्यक्ष ने दी प्रेरणा

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वाराणसी, 31.01.2026. काशी हिंदू विश्वविद्यालय, विज्ञान संस्थान के महामना सेमिनार कॉम्पलेक्स के साभागार में शुक्रवार को अचिंत्य पत्रिका के कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) विशेषांक और विज्ञान गंगा के 13वें अंक का लोकार्पण समारोह आयोजित हुआ। मुख्य अतिथि पद्मश्री ए.एस. किरण कुमार (पूर्व इसरो अध्यक्ष) ने विक्रम साराभाई के योगदान को रेखांकित करते हुए भारत की अंतरिक्ष यात्रा पर विस्तार से चर्चा की।

किरण कुमार ने कहा कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद रूस-अमेरिका के बीच अंतरिक्ष दौड़ शुरू हुई। रूस आगे निकल गया तो अमेरिका ने उसे पीछे करने की रणनीति बनाई। ठीक उसी समय भारत की स्वतंत्रता के मात्र 10 वर्ष ही हुए थे और वह देश दुनिया को समझने की कोशिश कर रहा था। इसी दौर में विक्रम साराभाई ने भारत को प्रौद्योगिकी से जोड़कर अंतरिक्ष क्षेत्र में स्थापित किया।

उन्होंने बताया कि जियोस्टेशनरी उपग्रह के बाद NASA के सहयोग से मात्र एक वर्ष में 2400 गाँवों में सैटेलाइट ब्रॉडकास्टिंग सेवा शुरू की गई। हम दिल्ली में बैठे लोगों की बातें सुन पाते हैं, यह इसरो की देन है। देश को आगे बढ़ाने की सोच विक्रम साराभाई की दूरदर्शिता का परिणाम है। इसरो ने 1999 में उपग्रह के माध्यम से मछुआरों को बताया गया कि कहाँ अधिक मछली मिलेगी, चक्रवात की भविष्यवाणी 3-4 दिन पहले संभव हुई। भारत ने अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का उपयोग मुख्य रूप से गैर-सैन्य उद्देश्यों (कृषि, मौसम, मछली पालन, दूरसंचार) के लिए किया, जबकि विश्व में इसका ज्यादातर सैन्य उपयोग होता है।

2008 में चंद्रयान-1 ने चंद्रमा पर पानी के अणुओं की खोज की। चंद्रयान-2 में चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव (जहाँ कोई नहीं उतरा था) पर लैंडिंग का लक्ष्य रखा गया, जिसके लिए पूर्ण स्वदेशी नया इंजन विकसित किया गया। 2019 की असफलता से सबक लेकर 2023 में चंद्रयान-3 ने सफल सॉफ्ट लैंडिंग की और तब पूरी दुनिया भारत की ओर देख रही थी। मंगल मिशन (मंगलयान) और आदित्य-एल1 (सूर्य किरणों का अध्ययन) की सफलताएँ भी रेखांकित की गईं।

किरण कुमार ने इसरो का मूल मंत्र बताया,“हमें अपनी ग़लतियों से ही नहीं, दूसरों की गलतियों से भी सीखना चाहिए।” उन्होंने कहा कि अनपढ़ मछुआरे भी सैटेलाइट नेविगेशन का उपयोग कर रहे हैं जो भारत की बड़ी उपलब्धि है । कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने ‘अचिन्त्य’ की टीम को उनके उत्कृष्ट प्रयासों के लिए बधाई देते हुए कहा कि अचिंत्य की टीम काशी हिंदू विश्वविद्यालय में एक अनोखा उदाहरण प्रस्तुत कर रही है।

उन्होंने कहा कि बीएचयू और इसरो—दोनों ही देश का गौरव हैं। इसरो ने देश में एक नए प्रकार के स्वाधीनता संग्राम की भावना को जन्म दिया है, जो विज्ञान और प्रौद्योगिकी के माध्यम से आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि परमाणु ऊर्जा विभाग का योगदान भी देश के ऐतिहासिक क्षणों से जुड़ा रहा है, और ऐसे संस्थानों से विश्वविद्यालय का जुड़ाव गर्व की बात है।

प्रो. चतुर्वेदी ने कहा कि ‘अचिन्त्य’ का यह संस्करण अत्यंत परिश्रमपूर्ण और सराहनीय कार्य का परिणाम है। उन्होंने सुझाव दिया कि ‘अचिन्त्य’ में पॉडकास्ट को भी शामिल किया जाना चाहिए, क्योंकि आज के समय में पढ़ने की क्षमता में कमी देखी जा रही है। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि इस पत्रिका का अनुवाद अन्य भारतीय भाषाओं—जैसे बांग्ला, मराठी, तमिल, तेलुगु आदि—में किया जाए, जिससे इसके प्रभाव और पहुँच का विस्तार हो सके। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इस पहल के माध्यम से भारत विज्ञान के क्षेत्र में नेतृत्वकारी भूमिका निभा सकता है।

विज्ञान संकाय संकाय प्रमुख प्रो. राजेश कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि संकाय के शोधकर्ता स्पेस मिशनों पर कार्य कर देश की प्रगति में योगदान दे रहे हैं। उन्होंने बीएचयू और इसरो के बीच आत्मविश्वास बढ़ाने वाली समानता को बताया।

कार्यक्रम का संचालन छात्रा दीपांशी अग्रवाल ने किया। इस अवसर पर अचिंत्य एवं विज्ञान गंगा की पूरी टीम, प्रो. रजनीकांत, डॉ. राघव, डॉ. चंद्रशेखर, डॉ. अखिलेश, डॉ. अकीब सहित बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे। समारोह में भारत की अंतरिक्ष उपलब्धियों को शांतिपूर्ण विकास के प्रतीक के रूप में सराहा गया और युवा पीढ़ी को इसरो के आदर्शों से प्रेरणा लेने का आह्वान किया गया।

 

रिपोर्ट विजयलक्ष्मी तिवारी

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