सिरप कांड में आरोपी एसटीएफ के बर्खास्त सिपाही आलोक सिंह के बंगले की चर्चा ज़ोरों पर है। सवाल सीधा है सिपाही की तनख़्वाह में इतना आलीशान बंगला कैसे हकीकत यह है कि ज़्यादातर सिपाही और दरोगा पूरी नौकरी रगड़-घिस कर निकाल देते हैं। लोन, जुगाड़ और किस्मत साथ दे तो रिटायरमेंट तक कहीं जाकर एक अदद मकान बन पाता है।
लेकिन ज़रा आलोक सिंह से नज़र हटाइए। बनारस के बेहद महंगे इलाके में, कार्नर प्लॉट पर खड़ा एक और आलीशान बंगला है। ज़मीन के रेट करोड़ों में, और उस पर खड़ा यह भवन भी करोड़ों की लागत से तैयार। मालिक विजिलेंस विभाग का एक हेड कांस्टेबल। लेकिन रहन-सहन ऐसा कि ड्राइवर के साथ स्कॉर्पियो चलता है और स्वयं का परिचय सीओ का देता है, अन्य प्रापर्टी की भी चर्चा है।
बताया जाता है कि अपने बचाव के लिए पत्नी को किसी व्यवसायिक गतिविधि में जोड़ा है। पिछले साल एंटी करप्शन में डीआइजी अपने बड़े भाई को इस बंगले कि फ़ोटो भेजकर उनसे पूछा कि भईया बताईये की यह बंगला किसका हो सकता है तो उन्होंने अनुमानतः कहा किसी बड़े नेता/व्यापारी का होगा। जब मैंने उन्हें यह बताया कि भईया यह एक हेडकांस्टेबल का बंगला है तो वह आश्चर्य प्रगट करने लगें।
क्योंकि बंगले को देखकर कोई भी चौंक सकता है इसकी लक्ज़री भी उस ओहदे की है। उसने महंगे आर्किटेक्ट को लाखों देकर नक्शा बनवाया है। नक्काशीदार पत्थर, महंगे मटेरियल और हाई-एंड फिनिशिंग इस बात की गवाही देते हैं कि शौक साधारण नहीं हैं। देखने वाला एक पल को भी इसे सरकारी तनख़्वाह की उपज नहीं मान सकता।
ख़ैर, बात सिर्फ एक बंगले या एक नाम की नहीं है। यह तो महज़ एक बानगी भर है। बनारस में ऐसे कई सिपाही और दरोगा हैं जिनके मकान देखकर “मकान” शब्द कहना ही तौहीन लगता है। उन्हें महल कहा जाए तो ज़्यादा सटीक होगा। ऊँची चहारदीवारी, शानदार गेट, लग्ज़री गाड़ियाँ और शाही ठाठ सब कुछ मौजूद है।
सब जानते हुये भी मैं ऐसी बातों को अखबारी शक्ल इसलिए नही देता क्योंकि पुलिस के प्रति बहुत नकारात्मक औऱ उनकी जड़ें खोदने वालों में से मेरी सोच नही रही है।
बहरहाल यही कहूंगा की आलोक सिंह हो या विजलेंस वाला यह भाई इन्होंने दरम्याने नौकरी सब ईमानदारी से ही कमाया गया होगा।आखिर बनारस में ईमानदारी भी अब महलों में ही रहती है।
रिपोर्ट – जगदीश शुक्ला










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