संघियों-भाजपाइयों, वक्त आ गया है कि अब तुम तमीज से बहस करना सीख लो। कुछ भी बक-बक करने से अब तक काम चल गया, अब नहीं चलेगा। आगे बहस में टिकने की क्षमता ही काम आएगी। कांवड़ ढोना नहीं, जयश्री राम करना नहीं, हिंदू-मुस्लिम खेलना नहीं। इसका समय अब गया। आगे बढ़ो। लफ्फाजी का जितना लाभ मिल सकता था, तुम्हारे नेता को मिल चुका। वह इसके जितने मजे ले सकता था, ले चुका। अब उसका मुंह सूखने लगा है, उससे झाग आने लगे हैं। ये रणनीति अब कारगर नहीं रही। जरूरत से ज्यादा एक्सपोज़ हो चुकी है, उसका पर्दाफाश हो चुका है। उसकी मियाद खत्म हो चुकी है। एक्सपायरी डेट निकल चुकी है। अमित शाह मत बनो। वे अब अप्रासंगिक हो चुके हैं। चीख-चिल्लाहट के राष्ट्रवाद का युग देखो, वह जा चुका।
यह जान लो कि अब तुम्हारे पास 2047 तक का नहीं, बल्कि 2029 का पूरा साल भी है या नहीं, कोई निश्चित रूप से नहीं जानता। दुनिया को तुम गालियों से बहुत नवाज़ चुके। देशद्रोही, नक्सली, पाकिस्तानी आदि बहुत उच्चार चुके। अब तर्कसंगत बहस ही चलेगी। पर बहस के लिए वर्षों तक अध्ययन करना पड़ता है, जो भाजपाइयों के लिए इस जन्म में संभव नहीं और अगला जन्म होता नहीं! नान-बायोलॉजिकल भी कोई होता नहीं।
मसलन तुम आज ‘वंदे मातरम्, वंदे मातरम्’ पर बच्चों की तरह बहुत उछल रहे हो। अमित शाह की छात्रों की जबर्दस्त पिटाई के मुद्दे पर जबान आज तक तालू से चिपक हुई है, मगर आजकल वंदेमातरम के ‘योद्धा’ बने हुए हैं। इसे सबको पूरा गाना पड़ेगा, इसके हम दो टुकड़े नहीं होने देंगे। कांग्रेस देशविरोधी है। कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के दबाव में मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए केवल इसके दो शुरुआती छंद गाना स्वीकार किया था। कांग्रेस नई मुस्लिम लीग है। ये राग,ये बंदिश अब पुरानी पड़ चुकी।
अब इस तरह की फतवेबाजियां बेदम हो चुकी हैं। 20 जुलाई के बाद का समय है यह। उससे पहले का नहीं। बहस में अपनी बात को ऐतिहासिक दस्तावेजों से साबित करना होता है।संदर्भ बताना होता है। मोदी-शाह नहीं बनना होता। कांग्रेस ने चुनौती दे दी है कि तुम जो कह रहे हो, वह सच नहीं है।1937 के चुनावों में कांग्रेस मजबूत थी और मुस्लिम लीग तो मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में भी कांग्रेस से हार चुकी थी।
आज की कांग्रेस कह रही है कि तुम्हें जो करना हो, जिस कानून का सहारा लेना हो, ले लो, मगर हम वंदेमातरम पूरा नहीं गाएंगे। 1937 से इसके दो छंद गा रहे हैं, आगे भी वे ही गाएंगे। यह निर्णय महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर की अनुशंसा पर महात्मा गांधी, सुभाष चन्द्र बोस, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद, नरेन्द्र देव, गोविंद वल्लभ पंत आदि बड़े नेताओं ने लिया था। क्या ये तुम्हारी तरह वोट बैंक पालिटिक्स करनेवाले घटिया लोग थे? देशद्रोही थे? क्या नरेंद्र मोदी-अमित शाह मंडली इनसे भी बड़े राष्ट्रवादी है? फिर हमें बताएं कि वंदेमातरम को पूरा क्यों गाना चाहिए, दो छंद क्यों नहीं? फिर ये भी बताएं कि 2014 से 2025 तक खुद सरकार के नेता इसके दो छंद क्यों गाते रहे। यह ग़लत था, तो देश से इसके लिए माफी मांगें! फिर इसकी भी क्षमा मांगें कि आजादी की लड़ाई के समय वंदेमातरम संघ-हिंदू महासभा के नेताओं की जुबान पर क्यों नहीं चढ़ा? कितनी बार इसे वीर सावरकर ने गाया? कितनी बार इसे गुरु गोलवलकर ने गाया?
तुम जो भी कहते हो, मानते हो, उस पर कांग्रेसियों से बहस करो। याद रखो स्वर ऊंचा रखने से बौद्धिक बहसें जीती नहीं जातीं। अपनी बात को ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर सिद्ध करना होता है। चाहो तो अपनी ओर से बहस में प्रधानमंत्री जी को ले आ़ओ और उधर से राहुल गांधी आ जाएं। इनमें से जो भी बहस से भागने की कोशिश करे, उसे भगोड़ा कहो। बहस में तर्क से जो भी इधर-उधर हिले, आयं-बांय-शांय बके, आवाज़ ऊंची करे, वह हारा हुआ, तर्कहीन माना जाए। पप्पू शब्द तुम्हें बहुत पसंद है। उसे राष्ट्रीय पप्पू घोषित किया जाए। इस अवसर पर देश भर में राष्ट्रीय पप्पू दिवस मनाया जाए। राष्ट्रीय अवकाश घोषित किया जाए।
तुम कहोगे कि प्रधानमंत्री के पास क्या अकेला यही काम है?सच बताओ, उनके पास कोई काम है भी? कभी-कभी किसी फाइल पर दस्तखत करने के अलावा कोई और काम वे जानते हैं? फाइल तक पढ़ना-समझना तो उनके बूते में नहीं,यह वे खुद स्वीकार कर चुके हैं। भारत को पहली बार ऐसा अनोखा प्रधानमंत्री मिला है!
चलो फिर भी उनके लिए रोज फाइल के लिए दस मिनट अलग रख देते हैं। बहस के लिए समय निकालने के लिए उन्हें केवल इतना करना होगा कि छह बार की बजाय पांच बार कुर्ता, जैकेट, पजामा बदलना होगा। एक जोड़ी ड्रेस का दैनिक नुकसान झेलना होगा। इससे एक जोड़ी कपड़े की राष्ट्रीय बचत होगी, टेलर मास्टर का समय बचेगा और बहस की तैयारी के लिए रोज प्रधानमंत्री को काफी समय मिलेगा। देश के लिए गांधी, नेहरू, नेताजी आदि ने अपना जीवन समर्पित कर दिया, जबकि देश आपसे केवल प्रतिदिन एक ड्रेस कम पहनने की अपेक्षा कर रहा है। पचास दिन नहीं, आपसे दिन के पचास मिनट मांगे जा रहे हैं।
समय बचाने के वैसे और भी उपाय हैं, लेकिन इन्हें बिना पढ़े ज्ञान बघारने और हास्यास्पद बनने की आदत है, इसकी लगन लग चुकी है, इसलिए इतना ही काफी है। यही स्थिति अमित शाह की भी है और भाजपा-संघ के दूसरे सूरमाओं और चूरमाओं की भी। तर्क और प्रमाण के साथ बहस कर सकने वाला इनमें एक भी शूरवीर नहीं। एक भी नहीं। एक स्वयंसेवक, एक प्रोफेसर, पार्टी का एक भी प्रवक्ता नहीं, जो सिलसिलेवार, सुचिंतित-सुविचारित बहस कर सके। भाजपा के बड़े- बड़े प्रवक्ताओं को तो टीवी चैनलों की डिबेट में ही राष्ट्रीय जनता दल की युवा प्रवक्ता प्रियंका भारती और आइसा की अध्यक्ष नेहा बोरा जैसी लड़कियां चुटकियों में जमीन सुंघाने की क्षमता रखती हैं।
तुमने पार्टियां खरीद लीं, नेताओं को खरीद लिया, ईडी-सीबीआई उनके पीछे लगा दी, मगर एक को भी समझदारी भरी, तार्किक बहस के लिए तैयार नहीं कर सके, क्योंकि तर्क और विवेक से तुम्हारी जानी दुश्मनी है। कोई तुम्हारे सर्वोच्च नेता के सामने बुद्धिमान, तार्किक दिखे, यह उन्हें स्वीकार्य नहीं। सब उनसे बौने दिखने चाहिए।
तो आओ फिर ‘दिमागी नक्सल’ पर बहस कर लेते हैं, क्योंकि इसके लिए तुम्हें दिमाग की जरूरत नहीं पड़ेगी। वैसे भी न तुम्हारे दिमाग का पता है, न तुम्हें पता है कि नक्सल क्या होता है। तुम्हारे लिए तो जो भी तुम्हारी काट का नहीं है — ‘दिमागी’ भी है और नक्सल’ भी!
(कई पुरस्कारों से सम्मानित विष्णु नागर साहित्यकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं। जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।)
2. देशभक्ति टेस्ट — वंदे मातरम्! : राजेंद्र शर्मा

मिल गया, मिल गया, मिल गया। देशभक्ति का टेस्ट मिल गया। टेस्ट भी एकदम आसान और मुफ्त भी। और मधुर। बल्कि संगीतमय। बहुत ही सिंपल टेस्ट है– वंदे मातरम् गाओ और देशभक्त कहलाओ! अब यह तो स्वयं सिद्ध है कि जो वंदे मातरम् भी नहीं गाए, वह कैसे भारतीय माना जाए?
पर अब क्या सचमुच मोदी जी जो कुछ भी करेंगे, विरोधी उसका ही विरोध करने लगेंगे? यह अंध-विरोध नहीं तो और क्या है? बताइए, अब विरोधियों को मोदी जी के देशभक्ति टेस्ट का भी विरोध करना है! मोदी जी ने और सिर्फ मोदी जी ने ही क्यों, उनकी पूरी सरकार ने और सिर्फ सरकार ने ही क्यों, उनके संघ परिवार ने, गोदी परिवार ने, बड़े कारोबारी संसार ने, सब ने मिलकर देशभक्ति का एक टेस्ट निकाला है। कड़ी मेहनत के बाद देशभक्ति का टेस्ट निकाला है। कड़ी मेहनत भी, साल-छ: महीने की नहीं, एक-दो साल की भी नहीं, पूरे बारह साल की कड़ी मेहनत के बाद देशभक्ति टेस्ट निकाला है। बल्कि इसमें अगर मोदी जी के उन प्रयत्नों को भी जोड़ दिया जाए, जो उन्होंने मुख्यमंत्री रहते हुए ही शुरू कर दिए थे, तो पूरी चौथाई सदी की मेहनत के बाद भगवा कुनबे ने यह देशभक्ति टेस्ट निकाला है। पर मोदी जी के विरोधी हैं कि उसका भी विरोध कर रहे हैं।
देशभक्ति का इतना सिंपल, इतना कारगर टेस्ट देखकर तो अब ज्ञानेश कुमार को भी अफसोस हो रहा होगा कि एसआईआर के चक्कर में नाहक इतनी गालियां खायीं। नाम काटे। नाम जोड़े। तार्किक विसंगति लगायी। और भी न जाने क्या-क्या किया, सिर्फ घुसपैठियों को खोज कर निकालने के लिए ही तो! क्योंकि उनसे किसी ने पूछा था कि घुसपैठियों को वोटर लिस्ट में रहना चाहिए क्या? काश, उन्हें भी तब यह देशभक्ति टेस्ट मिल जाता, तो उनका भी काम कितना आसान हो जाता। जो वंदे मातरम् नहीं गाए, वह वोटर सूची तो क्या देश के ही बाहर जाए। देशभक्ति के टेस्ट में ना पास होने वालों को, देश में रहने देना चाहिए क्या?
पर विरोधी हैं कि इतने आसान टेस्ट का भी विरोध कर रहे हैं। बहुतों को तो देशभक्ति के टेस्ट के आइडिया से ही प्रॉब्लम है। कह रहे हैं कि नागरिक के अधिकार से हम इस देश में रहते ही नहीं हैं, इस देश के मालिक भी हैं। देशभक्ति हमारे और देश के बीच का निजी मामला है, इसमें सरकार कैसे घुस सकती है और वह भी अपना ही नपना लेकर। और इनमें कई तो इतने दुष्ट हैं कि सबसे पहले तो उन्हें मोदी जी की सरकार की देशभक्ति टेस्ट कराने की योग्यता पर ही बहस करनी है। यह पेपर लीक वाली बात नहीं है। कहते हैं कि बाकी के ज्यादातर देशवासियों के पुरखों ने तो तभी देशभक्ति का टेस्ट दे दिया था, जब अंगरेज यह टेस्ट लिया करते थे। अंगरेजी राज का टेस्ट बहुत सख्त था। वह राज लाठी, जेल, गोली से और कभी-कभी तो फांसी से भी टेस्ट लेता था। पर तब जिन मोदी जी के पुरखे कभी देशभक्ति के टेस्ट में पास होना तो दूर रहा, उसमें बैठे तक नहीं, अब किस मुंह से दूसरों से देशभक्ति का टेस्ट देने की मांग कर सकते हैं?
उनसे भी ज्यादा ऐसे हैं, जो कह रहे हैं टेस्ट की बात तो खैर मजाक है, पर वंदे मातरम् गाने-गवाने में प्रॉब्लम नहीं है। हमारे पुरखे तो जमाने से गाते आए हैं, बल्कि उन्होंने ही इसे गाने के लिए अंगरेजों की लाठियां खा-खाकर, इसे गाने को देशभक्ति की निशानी बनाया था। हां! इतना जरूर है कि आम लोगों के बीच देशभक्ति की निशानी तो बने थे सिर्फ दो शब्द– ‘‘वंदे मातरम्’’। फिर भी गीत के पहले दो बंद भी गाना हमें मंजूर है, जो हम नब्बे साल से गाते आए हैं। रवींद्र नाथ टैगोर ने कहा था कि उतना गीत ही पूरे देश के गाने के लायक है। संविधान सभा ने भी कहा था कि इतना ही गीत राष्ट्रीय गीत होने के लायक है। लेकिन, पूरा गीत, सभी छ: बंद गाने की जबर्दस्ती, न नब्बे साल पहले देश को मंजूर थी और न आज मंजूर है।
मगर, यह तो एक तरह से देशभक्ति के टेस्ट को ही नामंजूर करना हो गया। अब देश भक्ति में नाप-जोख, मोल-तोल नहीं होता है। देशभक्ति में कम ज्यादा कुछ नहीं होता है — मोहब्बत की तरह या तो होती है या नहीं होती है। टेस्ट भी भरोसेमंद तभी होता है, जब पूरा हो। सही टेस्ट के लिए, वंदे मातरम् तो पूरा ही गाना पड़ेगा। सच पूछिए तो शुरू के बंद तो इतने टैम से गाए जा रहे हैं कि उनका तो टेस्टिंग वाला प्रभाव ही अब करीब-करीब खत्म हो चुका है। वह जो जनगण मन जैसा मामला हो गया है, जिसे कोई भी गाकर पास हो सकता है। असली टेस्ट तो बाद वाले पदों में ही है। याददाश्त का टेस्ट भी नहीं, असली देशभक्ति का टेस्ट — इसका इम्तहान कि देशभक्ति साबित करने के लिए, अपने धार्मिक या अन्य विश्वासों को पूरी तरह छोडऩे को तैयार हो या नहीं? नहीं ; तो हो गया टेस्ट — यही तो साबित करना था!
और यह दलील तो एकदम ही गलत है कि 1937 से हम तो वंदे मातरम् के पहले दो अंतरे ही गाते आए हैं, इसलिए अब भी पहले दो अंतरे ही गाएंगे। तब अंगरेज नहीं गाने देते थे, इसलिए दो अंतरे गाना तो छोड़ो, ‘‘वंदे मातरम्’’ बोलना भी काफी था। बल्कि बहुतेरे तो ऐसे अंडरग्राउंड देशभक्त थे कि ‘‘वंदे मातरम्’’ भी नहीं बोलते थे। और दस साल में चूंकि दो अंतरे गाने की ही आदत पड़ गयी, तो संविधान सभा ने भी बिना सोचे-समझे उतने को ही राष्ट्रीय गीत बना दिया। पर जब अंगरेज चले गए, उनके डंडे चले गए, जब तब वाले अंडर ग्राउंड देशभक्तों के वारिसों का राज आ गया, तब क्यों न सब से वंदे मातरम के पूरे छ: अंतरे गवाए जाएं! और जो न गाए, उसे पाकिस्तान, अफगानिस्तान, कब्रिस्तान, कहीं तो भिजवाएं।
अब प्लीज कोई ये मत कहना कि वंदे मातरम् गाने वाली देशभक्ति की परीक्षा, खुद नागपुर परिवार ने क्यों नहीं अपनायी? वे खुद सदा ‘‘नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे’’ ही क्यों करते रहे? सुना है नाथूराम गोडसे ने तो गांधी की हत्या के लिए फांसी से पहले भी ‘‘नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे’’ ही किया था। सिंपल है, वे सब तब अंडरग्राउंड देशभक्त थे। ‘‘नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे’’ उनका वंदे मातरम् ही तो था, अंग्रेजों से छुपा हुआ भी और पूरा भी। अब ओवरग्राउंड हैं, तो पूरा वंदे मातरम गाएंगे भी और बाकी सब से गवाएंगे भी। अब वे यह कहने को आज़ाद हैं ‘भारत में अगर रहना होगा, वंदे मातरम गाना होगा’। जेन ज़ी अपना देख ले, उसे वंदे मातरम् गाना है या बाहर जाना है!
(व्यंग्यकार वरिष्ठ पत्रकार और ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)









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