कलम की ताकत को पहचानिए, पत्रकार एकजुट हो जाइए। अब कोई पत्रकार अकेला नहीं रहेगा

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जौनपुर

पत्रकारिता केवल समाचार लिखने का माध्यम नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आवाज को समाज और शासन तक पहुंचाने की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में से एक है। जब यही आवाज दबाने, डराने या कमजोर करने का प्रयास होता है। तब पत्रकारों की एकजुटता और उनके अधिकारों की सुरक्षा का सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

इसी सोच के साथ राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा आयोग पत्रकारों की सुरक्षा, सम्मान, अधिकार और न्याय से जुड़े मुद्दों को मजबूती से उठाने का प्रयास कर रहा है। आयोग के संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष निशिकांत राय के नेतृत्व में संगठन का विस्तार देश के लगभग 16 राज्यों तक होने का दावा किया जा रहा है। यह विस्तार केवल पदाधिकारियों की संख्या बढ़ने तक सीमित नहीं, बल्कि पत्रकारों के बीच संगठनात्मक एकता और सहयोग की भावना को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा रहा है।

आयोग की राष्ट्रीय, प्रदेश, मंडल, जिला और तहसील स्तर की समितियों से जुड़े पदाधिकारियों के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती केवल संगठन का विस्तार करना नहीं, बल्कि पत्रकारों के सुख-दुख में उनके साथ खड़े होकर संगठन के उद्देश्य को जमीन पर उतारना है।

पद नहीं, जिम्मेदारी है। पत्रकार सुरक्षा की असली पहचान

आज देश में अनेक पत्रकार संगठन अपने-अपने स्तर पर पत्रकारों के हितों के लिए कार्य कर रहे हैं। सभी के उद्देश्य और कार्यप्रणाली अलग हो सकती है। लेकिन पत्रकारों की समस्याओं का मूल प्रश्न एक ही है। जब पत्रकार पर संकट आएगा, तब उसके साथ कौन खड़ा होगा।

यही सवाल पत्रकार समाज को आत्ममंथन के लिए मजबूर करता है।

पत्रकार किसी भी अखबार से जुड़ा हो, किसी न्यूज चैनल में कार्य करता हो, डिजिटल मीडिया से जुड़ा हो अथवा स्वतंत्र पत्रकार के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभा रहा हो। यदि वह समाज के सामने सच रखने का प्रयास करता है। तो उसके सम्मान और सुरक्षा का प्रश्न महत्वपूर्ण है।

संगठन अलग हो सकते हैं। विचार अलग हो सकते हैं। और मंच अलग हो सकते हैं। लेकिन पत्रकारिता की गरिमा और पत्रकार की सुरक्षा के मुद्दे पर एकजुटता आवश्यक है।

अनुभव और युवा ऊर्जा का संगम

राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा आयोग की कार्यप्रणाली में अनुभवी लोगों के मार्गदर्शन और पत्रकारिता जगत से जुड़े लोगों के अनुभव को महत्व दिए जाने की बात सामने आती रही है। सेवानिवृत्त प्रशासनिक एवं पुलिस अधिकारियों तथा अनुभवी पत्रकारों के अनुभव का लाभ संगठन को प्राप्त होना इसकी कार्यक्षमता को और मजबूत करने की दिशा में उपयोगी हो सकता है।

किसी भी संगठन की वास्तविक ताकत उसके पदाधिकारियों की संख्या नहीं, बल्कि संकट की घड़ी में उसके सदस्यों के साथ खड़े होने की क्षमता होती है।

अब जरूरत है। ‘मैं’ नहीं, ‘हम’ की

पत्रकारिता के सामने आज डिजिटल युग की चुनौतियां, सामाजिक दबाव, कानूनी जटिलताएं, आर्थिक समस्याएं और कार्य के दौरान आने वाली अनेक कठिन परिस्थितियां मौजूद हैं। ऐसे समय में पत्रकारों के बीच संवाद, सहयोग और कानूनी एवं संस्थागत जागरूकता को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है।

इसलिए पत्रकार संगठनों के पदाधिकारियों को अपने पद को केवल सम्मान का प्रतीक नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का संकल्प मानना होगा।

जिला अध्यक्ष से लेकर तहसील अध्यक्ष तक, प्रदेश पदाधिकारी से लेकर राष्ट्रीय पदाधिकारी तक हर व्यक्ति को यह सुनिश्चित करने का प्रयास करना चाहिए कि संगठन का नाम केवल कागजों पर नहीं, बल्कि जरूरतमंद पत्रकार की मदद के समय दिखाई दे।

एक पत्रकार की आवाज सीमित हो सकती है। लेकिन एकजुट पत्रकारिता की आवाज नहीं

किसी एक पत्रकार की आवाज को दबाने का प्रयास किया जा सकता है। लेकिन यदि पत्रकार समाज संगठित होकर संवैधानिक और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखे, तो उसकी आवाज कहीं अधिक प्रभावशाली बन सकती है।

यही संदेश आज देशभर के पत्रकारों तक पहुंचना जरूरी है।

न पत्रकार बंटेगा,
न पत्रकार झुकेगा,
न पत्रकार अकेला रहेगा।

जहां पत्रकार के साथ अन्याय का आरोप हो, वहां निष्पक्ष जांच और न्याय की मांग उठनी चाहिए। जहां पत्रकार संकट में हो, वहां उसकी सहायता के लिए संस्थागत प्रयास होने चाहिए। और जहां पत्रकार अपने अधिकारों से अनजान हो, वहां उसे जागरूक करने की जिम्मेदारी भी संगठनों को निभानी चाहिए।

असली पहचान पद से नहीं, कर्म से बनेगी

आज आवश्यकता इस बात की है। कि पत्रकार संगठन एक-दूसरे को कमजोर करने के बजाय पत्रकारिता को मजबूत करने की दिशा में काम करें। प्रतिस्पर्धा हो तो बेहतर कार्य की हो, पहचान की हो तो सेवा की हो और सम्मान मिले तो पत्रकारों के हित में किए गए कार्यों के कारण मिले।

कलम की ताकत केवल स्याही में नहीं होती। उसकी ताकत उसके पीछे खड़े सत्य, साहस और जिम्मेदारी में होती है।

राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा आयोग सहित देश के तमाम पत्रकार संगठनों के पदाधिकारियों के लिए यह समय आत्ममंथन का भी है। और संकल्प का भी।

यदि संगठन का प्रत्येक पदाधिकारी यह ठान ले कि उसके क्षेत्र में किसी पत्रकार को संकट के समय स्वयं को अकेला महसूस नहीं होने दिया जाएगा, तो पत्रकार एकता का वास्तविक अर्थ जमीन पर दिखाई देगा।

लेखनी की पहचान शब्दों से नहीं, सत्य के पक्ष में खड़े होने से बनती है।

पत्रकारिता में स्थायी पहचान किसी पद, परिचय या प्रचार से नहीं बनती। पहचान तब बनती है। जब आपकी लेखनी समाज के कमजोर व्यक्ति की आवाज बने, जब आपका शब्द अन्याय के खिलाफ खड़ा हो और जब आपकी पत्रकारिता सत्ता या व्यवस्था से सवाल पूछने का साहस रखे।

इसीलिए आज जरूरत है। कि पत्रकार अपने संगठन, अपने मंच और अपनी व्यक्तिगत पहचान से ऊपर उठकर पत्रकारिता की गरिमा और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए एकजुट हों।

क्योंकि

कलम बिकनी नहीं चाहिए।
कलम झुकनी नहीं चाहिए।
कलम डरनी नहीं चाहिए।
और पत्रकार कभी अकेला नहीं होना चाहिए।

संदेश स्पष्ट है।

पत्रकार की सुरक्षा केवल पत्रकार की जिम्मेदारी नहीं यह समाज, प्रशासन और लोकतांत्रिक व्यवस्था की सामूहिक जिम्मेदारी है।

आइए, पद को प्रतिष्ठा नहीं, सेवा बनाएं।
संगठन को संख्या नहीं, शक्ति बनाएं।
और पत्रकारिता को केवल पेशा नहीं, लोकतंत्र की जिम्मेदार आवाज बनाएं।

जब कलम एकजुट होगी, तो आवाज मजबूत होगी।
जब आवाज मजबूत होगी, तो न्याय की मांग मजबूत होगी।
और जब पत्रकार सुरक्षित होगा, तभी उसकी कलम पूरी स्वतंत्रता और निर्भीकता से समाज के सामने सच रख सकेगी।

*जय पत्रकार एकता।
जय पत्रकारिता।
जय हिंद।*

✍️सुरेश कुमार शर्मा
राष्ट्रीय अध्यक्ष के विशेष सलाहकार
राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा आयोग

 

रिपोर्ट –  सुरेश कुमार शर्मा

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