असीम श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ रामनगर सिंह सभा में मनाया गया ‘बाल प्रीतम’ श्री गुरु हरकिशन साहिब जी का प्रकाश पर्व श्रद्धालुओं ने लिया गुरु चरणों का आशीर्वाद, अखंड पाठ, कीर्तन और लंगर सेवा रही आकर्षण का केंद्र

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रामनगर

सिखों के आठवें गुरु, ‘बाल प्रीतम’ श्री गुरु हरकिशन साहिब जी का पावन प्रकाश पर्व रामनगर स्थित गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा में अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और भव्यता के साथ मनाया गया।

इस पावन अवसर पर तड़के अमृत वेला से ही गुरुद्वारा साहिब में दूर-दराज से आई संगतों का सैलाब उमड़ पड़ा।

पूरे गुरुद्वारा परिसर को रंग-बिरंगी लाइटों, फूलों और बैनरों से आकर्षक ढंग से सजाया गया था, जिससे पूरा वातावरण रूहानी और अलौकिक प्रतीत हो रहा था।

शहर के प्रमुख मार्गों पर भी गुरु साहिब के प्रकाश पर्व के स्वागत में बैनर और झंडियां लगाई गई थीं, जिससे पूरा क्षेत्र गुरुमय हो उठा।

प्रातःकालीन कार्यक्रम की भव्य शुरुआत

समागम की शुरुआत प्रातःकाल श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के प्रकाश और पालकी साहिब की सजावट के साथ हुई। इसके पश्चात संगतों ने मत्था टेककर गुरु चरणों में अपनी हाजिरी लगाई।

गुरुद्वारा परिसर को दिन भर के इस विशेष आयोजन के लिए विशेष रूप से सुसज्जित किया गया था, जहाँ बैठने, जूता-घर, पार्किंग और चिकित्सा सहायता जैसी सभी व्यवस्थाएं सुचारू रूप से की गई थीं।

दिन भर चला धार्मिक समागम

दिन भर चले इस विशेष व विशाल धार्मिक समागम में संगतों ने पूरे उत्साह और श्रद्धाभाव के साथ भाग लिया।

कार्यक्रम की रूपरेखा इस प्रकार रही:

श्री अखंड पाठ साहिब का भोग: कुछ दिन पूर्व आरंभ हुए श्री अखंड पाठ साहिब जी के भोग प्रातःकाल विधिपूर्वक डाले गए, जिसके पश्चात विशेष दीवान सजाए गए और संगत ने कढ़ाह प्रसाद ग्रहण किया।

अलौकिक शबद कीर्तन: हज़ूरी रागी जत्थों तथा विशेष रूप से आमंत्रित कीर्तनी जत्थों ने अपनी मधुर वाणी में गुरबाणी का गायन कर संगतों को निहाल किया। “श्री हरिकृसन धिआइऐ जिस डिठै सभि दुखि जाइ” शबद के गायन ने उपस्थित संगतों को भावविभोर कर दिया और पूरा पंडाल ‘बोले सो निहाल, सत श्री अकाल‘ के जयकारों से गूंज उठा। ढोल-नगाड़ों और शबद-कीर्तन की स्वर लहरियों ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया।

कथा एवं गुरमत विचार: कथावाचकों और ज्ञानी जी ने श्री गुरु हरकिशन साहिब जी के संक्षिप्त परंतु तेजस्वी जीवन, उनके त्याग, उनकी दिव्यता और शिक्षाओं पर विस्तार से प्रकाश डाला।

उन्होंने बताया कि किस प्रकार मात्र पाँच वर्ष की अत्यंत छोटी आयु में गुरु गद्दी संभालकर गुरु साहिब ने अद्भुत आध्यात्मिक परिपक्वता, ज्ञान और धैर्य का परिचय दिया, जो आज भी संसार के लिए प्रेरणा स्रोत है।

मानवता और निस्वार्थ सेवा का संदेश

समागम को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने गुरु साहिब के जीवन को मानवता की सेवा का सर्वोच्च प्रतीक बताया।

उन्होंने दिल्ली में उस दौर में फैली चेचक जैसी भयंकर महामारी के दौरान गुरु साहिब द्वारा बिना किसी धर्म, जाति अथवा भेदभाव के मरीजों की गई निस्वार्थ सेवा का विशेष रूप से स्मरण कराया, जिसके कारण उन्हें ‘बाल प्रीतम’ और ‘शहनशाह’ जैसी उपाधियों से नवाजा जाता है।

वक्ताओं ने उपस्थित युवाओं और संगतों से आह्वान किया कि वे गुरु साहिब के दिखाए हुए परोपकार, दीन-दुखियों की सेवा, करुणा और समानता के मार्ग पर चलें और समाज में भाईचारे को बढ़ावा दें।

‘सरबत के भले’ की अरदास और अटूट लंगर सेवा

कार्यक्रम के अंतिम चरण में समूचे विश्व के कल्याण अर्थात ‘सरबत के भले’ के लिए विशेष अरदास की गई और पावन हुकमनामा लिया गया, जिसे संगत ने अत्यंत श्रद्धा के साथ शीश झुकाकर सुना।

दीवान की समाप्ति के पश्चात गुरु का अटूट लंगर बरताया गया।

गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी, स्थानीय युवाओं, सेवादारों और महिला मंडलों ने लंगर तैयार करने से लेकर उसे संगतों में वितरित करने तक हर सेवा पूरे समर्पण भाव से निभाई।

पंगत में बैठकर बिना किसी जाति, धर्म या ऊँच-नीच के भेदभाव के सभी वर्गों के लोगों ने एक साथ लंगर छका, जो सिख धर्म की समानता और भाईचारे की महान परंपरा को साकार करता है। देर शाम तक लंगर सेवा अनवरत जारी रही।

अंत में, गुरुद्वारा सिंह सभा की प्रबंधक कमेटी ने समागम को सफल बनाने में सहयोग देने वाले समस्त सेवादारों, कीर्तनी जत्थों, ज्ञानी जी, सुरक्षा में तैनात स्वयंसेवकों और भारी संख्या में पधारी संगतों का हृदय से धन्यवाद ज्ञापित किया।

कमेटी पदाधिकारियों ने कहा कि आने वाले वर्षों में भी इस पावन पर्व को इसी भव्यता और श्रद्धा के साथ मनाया जाता रहेगा, ताकि नई पीढ़ी गुरु साहिब की शिक्षाओं से जुड़ी रहे।

 

रिपोर्ट – रिम्मी कौर

 

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