जौनपुर
कभी-कभी इंसान रोता नहीं है। क्योंकि उसकी आंखों के आंसू खत्म नहीं होते, बल्कि इसलिए कि दर्द इतना गहरा होता है। कि आंसू भी उसका साथ छोड़ देते हैं।
कभी-कभी कोई व्यक्ति समाज के सामने अपनी कहानी इसलिए नहीं रखता कि उसे किसी से बदला लेना है। बल्कि इसलिए कि शायद उसकी पीड़ा किसी दूसरे परिवार को उसी दर्द से बचा सके।
आज नाई समाज के सामने ऐसी ही एक पीड़ा लेकर खड़े हैं। सुरेश कुमार शर्मा
लगभग 13–14 वर्षों से जिंदगी की कठिन परिस्थितियों से जूझते हुए सुरेश कुमार शर्मा ने अपने नाई समाज के देवतुल्य भाई-बहनों के नाम एक भावुक खुला पत्र लिखकर अपने जीवन के उन जख्मों को सामने रखा है। जिन्हें शब्दों में बयां करना भी आसान नहीं है।
परिवार के साथ दर-दर भटकने का दर्द, मां का साया सिर से उठ जाना, भाई-भाभी का बिछड़ जाना, 18 वर्षीय बेटे की हत्या, घर में चोरी, पत्नी के हाथ टूटने और एक के बाद एक आती पारिवारिक परेशानियों ने उनके जीवन को भीतर तक झकझोर दिया।
लेकिन इतना सब सहने के बाद भी उन्होंने समाज से नफरत नहीं की।
उन्होंने विश्वास नहीं छोड़ा।
और शायद यही उनके दर्द की सबसे बड़ी ताकत है।
इंसान बाहर से नहीं, भीतर से टूटता है। जब उसका विश्वास टूट जाता है।
सुरेश कुमार शर्मा कहते हैं। कि जिंदगी ने उन्हें बहुत कुछ सिखाया है। उन्होंने अपनों को खोया, मुश्किलें देखीं, ठोकरें खाईं, लेकिन सत्य और विश्वास का साथ नहीं छोड़ा।
उनकी पीड़ा में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर किसी इंसान को पूरी बात सुने बिना दोषी मान लेना कितना उचित है।
उनकी समाज से सीधी अपील है।
किसी भी मामले में किसी एक पक्ष की बात सुनकर फैसला मत कीजिए।
पहले दोनों पक्षों को सुनिए।
सत्य को समझिए।
परिस्थितियों को जानिए।
फिर निर्णय कीजिए।
क्योंकि कभी-कभी समाज का जल्दबाजी में दिया गया फैसला किसी टूटे हुए इंसान को जिंदगी भर के लिए और तोड़ देता है।
दहेज नहीं मांगा, केवल रिश्ता और सम्मान मांगा था
अपने बेटे के विवाह का उल्लेख करते हुए सुरेश कुमार शर्मा ने कहा कि उन्होंने कभी दहेज की मांग नहीं की।
उनका कहना था
कर्ज लेकर शादी मत कीजिए, हमें केवल रिश्ते चाहिए, दौलत नहीं।
उनके अनुसार विवाह सादगी और सम्मान के साथ हुआ और आज भी लोग उस बारात की चर्चा करते हैं। लेकिन समय बदला और उसी रिश्ते में कटुता तथा आरोपों का दौर आया।
यही वह मोड़ है। जिसने उन्हें व्यक्तिगत दर्द से निकालकर पूरे समाज के सामने एक बड़ा सवाल रखने के लिए मजबूर किया।
बेटियों और बेटों को केवल पढ़ाइए नहीं, संस्कार भी दीजिए
सुरेश कुमार शर्मा का कहना है। कि समाज का भविष्य केवल बड़ी-बड़ी इमारतों, संगठनों और पदों से नहीं बनेगा।
समाज तब मजबूत होगा, जब उसके घरों में
संस्कार होंगे,
सम्मान होगा,
संवाद होगा,
बड़ों का आदर होगा,
और रिश्तों को बचाने की भावना होगी।
उन्होंने समाज के हर एक माता-पिता से अपील की कि वे अपनी बेटियों और बेटों दोनों को परिवार की मर्यादा, आपसी सम्मान और संवाद का महत्व समझाएं।
क्योंकि जब बातचीत बंद होती है। तो गलतफहमियां जन्म लेती हैं।
जब सम्मान खत्म होता है। तो रिश्ते कमजोर पड़ते हैं।
और जब विश्वास टूटता है। तो पूरा परिवार भीतर से बिखरने लगता है।
नाई समाज को मजबूत संगठन चाहिए, दिखावा नहीं
अपने दर्द को समाज सुधार की आवाज बनाते हुए सुरेश कुमार शर्मा ने नाई समाज के सभी संगठनों से भी गंभीर आत्ममंथन की अपील की है।
उन्होंने कहा कि समाज को ऐसे संगठन चाहिए जो मुश्किल समय में समाज के व्यक्ति के साथ खड़े हों, उसकी बात सुनें, निष्पक्षता से सत्य जानें और जरूरत पड़ने पर न्यायपूर्ण तरीके से आवाज उठाएं।
उन्होंने कहा कि संगठन केवल नाम, पद, बैनर और मंच तक सीमित नहीं होने चाहिए।
संगठन का मतलब है। समाज के दुख में समाज के हर एक व्यक्ति के साथ खड़ा होना।
उनकी अपील है। कि समाज में यदि कोई ऐसी गलत परंपरा, अन्यायपूर्ण सोच या ऐसी व्यवस्था है। जिससे परिवार टूट रहे हैं। और लोगों का विश्वास समाज से उठ रहा है। तो उस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए।
उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि नाई समाज को ढकोसले नहीं, बल्कि नाई समाज के लोगों के लिए मजबूत, ईमानदार, संवेदनशील और न्यायपूर्ण संगठन चाहिए।
आज मेरे साथ जो हुआ, वह किसी और परिवार के साथ न हो
शायद उनके पूरे पत्र की सबसे दर्दनाक पुकार यही है।
उन्होंने ईश्वर से प्रार्थना की
किसी भी परिवार को वह दर्द न मिले, जो मेरे परिवार ने सहा है।
यह पंक्ति केवल सुरेश कुमार शर्मा की नहीं है।
यह उन तमाम परिवारों की आवाज हो सकती है। जिन्होंने रिश्तों में कड़वाहट, गलतफहमियों, आरोपों और टूटते विश्वास के कारण अपने घरों को बिखरते देखा है।
सत्य देर से जीतता है। लेकिन जब जीतता है। तो इतिहास बन जाता है।
सुरेश कुमार शर्मा ने अपने संदेश में कहा कि उन्हें किसी से द्वेष नहीं है।
उन्हें विश्वास है। कि सत्य एक दिन अवश्य सामने आएगा।
समय आने पर वह समाज के बीच अपनी पूरी बात रखेंगे और समाज के लोगों का आशीर्वाद लेंगे।
उनकी यह लड़ाई किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि उस सोच के खिलाफ दिखाई देती है। जिसमें बिना पूरी सच्चाई जाने किसी के बारे में राय बना ली जाती है।
उनकी आवाज में दर्द है। लेकिन नफरत नहीं।
उनके शब्दों में आक्रोश है। लेकिन बदले की भावना नहीं।
और उनके संदेश में सबसे बड़ी उम्मीद है। समाज जागे, रिश्ते बचें और आने वाली पीढ़ी ऐसी पीड़ा से बचे।
आज सवाल सुरेश कुमार शर्मा का ही नहीं, पूरे समाज का है।
क्या हम किसी की पूरी बात सुनते हैं।
क्या हम किसी विवाद में दोनों पक्षों को बराबर अवसर देते हैं।
क्या हम अफवाह और सत्य के बीच अंतर करते हैं।
क्या हमारे सामाजिक संगठन केवल पद और सम्मान तक सीमित हैं। या किसी पीड़ित व्यक्ति की आवाज बनने के लिए भी तैयार हैं।
क्या हम अपने बच्चों को केवल पढ़ा रहे हैं। या उन्हें रिश्तों की कीमत और परिवार की मर्यादा भी सिखा रहे हैं।
इन सवालों का जवाब सुरेश कुमार शर्मा अकेले नहीं मांग रहे हैं।
इन सवालों का जवाब शायद आने वाली पीढ़ियां भी हमसे मांगेंगी।
समाज ने जहां आवाज दी, वहां मैं हमेशा मौजूद रहा
सुरेश कुमार शर्मा ने भावुक होकर कहा कि जब-जब समाज ने आवाज दी, वह अपनी क्षमता के अनुसार समाज के साथ खड़े रहे।
आज जब वह स्वयं अपने जीवन के दर्द के साथ समाज के सामने खड़े हैं। तो उनकी समाज से केवल इतनी अपेक्षा है।
उनकी बात को सुना जाए।
बिना पूर्वाग्रह के सुना जाए।
सत्य को समझा जाए।
और निर्णय भावनाओं या अफवाहों से नहीं, बल्कि न्याय और संवेदना से किया जाए।
अंत में उनकी एक पुकार
सत्य को सुनिए…
संवेदना को समझिए
रिश्तों की कीमत पहचानिए…
और किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले दोनों पक्षों को सुनिए।
क्योंकि हो सकता है। आपके सामने खड़ा कोई मुस्कुराता हुआ इंसान अंदर से इतना टूट चुका हो कि उसकी खामोशी में पूरी जिंदगी की चीख छिपी हो।
और शायद सुरेश कुमार शर्मा की यह पुकार उसी खामोशी को आवाज देने की कोशिश कर रहे है।
सत्य देर से जीतता है।
लेकिन जब जीतता है। तो इतिहास बन जाता है।
समाज ने जहां आवाज दी, वहां मैं हमेशा मौजूद रहा।
आज मेरी आवाज है। समाज जागे, सत्य को सुने और किसी टूटे हुए परिवार को अकेला न छोड़े।
रिपोर्ट – सुरेश कुमार शर्मा









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