वाराणसी, 18 जून 2026।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के भोजपुरी अध्ययन केंद्र में गुरुवार को भोजपुरी साहित्य के संरक्षण, संवर्धन एवं वैश्विक प्रचार-प्रसार को लेकर एक महत्वपूर्ण कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला का विषय था – “भोजपुरी साहित्य के विविध पक्षों और रचनाओं को विकिपीडिया के पटल पर दर्ज करने की प्रक्रिया”।
इस अवसर पर विकीमीडियंस यूज़र ग्रुप तथा विकिमीडिया फाउंडेशन से जुड़े विशेषज्ञों ने विद्यार्थियों और शोधार्थियों को विकिपीडिया पर सामग्री तैयार करने और उसे प्रकाशित करने के व्यावहारिक पहलुओं की विस्तृत जानकारी दी।
कार्यशाला में विशेषज्ञों ने बताया कि वर्तमान समय में डिजिटल मंचों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है। यदि भोजपुरी साहित्य, लोक संस्कृति, लोककथाएं, साहित्यकारों की जीवनी तथा अन्य महत्वपूर्ण रचनात्मक सामग्री को विकिपीडिया पर व्यवस्थित रूप से दर्ज किया जाए,

तो यह न केवल देश बल्कि दुनिया भर के पाठकों और शोधकर्ताओं तक आसानी से पहुंच सकेगी। इससे भोजपुरी भाषा और साहित्य को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिलने के साथ-साथ इसके अध्ययन और शोध को भी बढ़ावा मिलेगा।
कार्यक्रम में स्रोतविदों के रूप में उपस्थित डॉ. अविनाश कुमार सिंह, डॉ. सत्यम मिश्रा तथा सौरभ तिवारी ने अपने-अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने विद्यार्थियों को बताया कि विकिपीडिया पर किसी भी विषय को दर्ज करने के लिए विश्वसनीय स्रोतों, संदर्भों और तथ्यों का होना आवश्यक है।
उन्होंने लेख निर्माण, संपादन, संदर्भ जोड़ने तथा सामग्री को प्रमाणिक बनाने की प्रक्रिया को प्रायोगिक रूप से समझाया। साथ ही प्रतिभागियों को विकिपीडिया के तकनीकी पहलुओं की भी जानकारी दी गई, जिससे वे स्वयं भोजपुरी साहित्य से संबंधित सामग्री तैयार कर सकें।
विशेषज्ञों ने कहा कि भोजपुरी भाषा विश्व के अनेक देशों में बोली और समझी जाती है। ऐसे में डिजिटल मंचों पर इसकी उपस्थिति मजबूत करना समय की आवश्यकता है। विकिपीडिया जैसे मुक्त ज्ञान मंच पर भोजपुरी साहित्य की अधिकाधिक सामग्री उपलब्ध होने से भाषा की समृद्ध परंपरा और सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक मंच प्राप्त होगा।

कार्यक्रम का स्वागत भाषण भोजपुरी अध्ययन केंद्र के समन्वयक प्रोफेसर प्रभाकर सिंह ने दिया। उन्होंने कहा कि भोजपुरी साहित्य की विशाल परंपरा को डिजिटल माध्यमों से नई पीढ़ी तक पहुंचाना अत्यंत आवश्यक है। कार्यशाला का संचालन डॉ. हरीश कुमार ने किया।
इस अवसर पर लगभग 50 से अधिक विद्यार्थी, शोधार्थी एवं साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे। प्रतिभागियों ने कार्यशाला को ज्ञानवर्धक बताते हुए कहा कि इससे उन्हें भोजपुरी साहित्य को डिजिटल दुनिया में स्थापित करने की नई दिशा और प्रेरणा मिली है। कार्यक्रम के अंत में सभी प्रतिभागियों ने भोजपुरी भाषा और साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए सक्रिय योगदान देने का संकल्प लिया।











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