यूरोप में मोदी जी की तस्वीरें देखकर भारत में दो तरह के लोग सक्रिय हो जाते हैं।
एक वो जो हर फोटो में “PR” खोजते हैं।
दूसरे वो जो quietly map खोलकर देखते हैं कि आखिर प्रधानमंत्री लगातार उन्हीं देशों में क्यों जा रहे हैं जिनका नाम आम भारतीय पहले मुश्किल से सुनता था।
सवाल यह है कि आखिर नॉर्वे, स्वीडन, नीदरलैंड और इटली इतने महत्वपूर्ण क्यों हो गए?
क्या सिर्फ घूमने गए थे?
अगर ऐसा होता तो ASML जैसी कंपनी का नाम बार-बार चर्चा में नहीं आता।
दुनिया में advanced semiconductor lithography machines लगभग सिर्फ ASML बनाती है और बिना उसके modern chip industry practically अधूरी है।
भारत आज semiconductor manufacturing ecosystem खड़ा करने की कोशिश कर रहा है। तो नीदरलैंड अचानक “छोटा यूरोपीय देश” नहीं रह जाता। वो strategic technology gatekeeper बन जाता है।
नॉर्वे को देखिए।
लोग एक पत्रकार वाले विवाद में उलझे रहे, लेकिन quietly shipping, green maritime technology, sovereign wealth funds और renewable investments पर बातचीत चल रही थी।
भारत अब सिर्फ सड़क और रेलवे नहीं बना रहा। भारत shipping fleet, green hydrogen, renewable supply chain और manufacturing depth बनाने की कोशिश कर रहा है।
स्वीडन केवल IKEA नहीं है। उसके पास advanced defense engineering, aerospace capability और niche industrial technology है।
इटली सिर्फ मेलोनी वाली फोटो नहीं है। Europe की major shipbuilding और aerospace companies वहीं बैठी हैं।
असल कहानी यह है कि भारत अब “सिर्फ बड़े देशों” पर dependent diplomacy नहीं चला रहा।
पहले Europe का मतलब सिर्फ Germany, France और UK माना जाता था। अब भारत सीधे उन देशों से संबंध बना रहा है जिनके पास niche technology, capital, shipping expertise, clean energy systems और advanced manufacturing knowledge है।
और यही चीज कुछ लोगों को uncomfortable कर रही है। क्योंकि अगर यूरोप की technology, भारत की manufacturing, भारत का market और भारत की political stability एक साथ जुड़ गई… तो global supply chain का बहुत बड़ा हिस्सा China-centric model से बाहर निकल सकता है।
यही असली खेल है।
इसीलिए आज renewable energy से लेकर shipbuilding, semiconductor से लेकर AI, green hydrogen से लेकर defense manufacturing तक हर जगह भारत को धीरे-धीरे insert किया जा रहा है।
ये results एक दिन में नहीं आएंगे।
2015 की विदेश यात्राओं का असर 2025 में semiconductor plants और manufacturing investments बनकर दिख रहा है।
शायद 2026 की ये यात्राएँ, 2030 वाले industrial India की foundation हों।
बाकी कुछ लोग अभी भी सिर्फ फोटो देखकर “इटली वाली meme diplomacy” में व्यस्त हैं।
रिपोर्ट – जगदीश शुक्ला









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