मिर्जापुर के अदलहाट और चुनार क्षेत्र में पिछले चार दिनों से जिस कथित अपहरण ने पुलिस प्रशासन की नींद उड़ा रखी थी, उसका अंत एक चौंकाने वाले खुलासे के साथ हुआ। पुलिस ने जिसे ‘अपराध’ समझा था, वह असल में एक सोची-समझी ‘साजिश’ निकली, जिसकी सूत्रधार खुद कथित पीड़िता ही थी।
1. घटना की पृष्ठभूमि (06 मई से 09 मई तक)
चुनार के दीक्षितपुर निवासी सरिता सिंह पटेल (यू-ट्यूबर व पत्रकार) ने शिकायत दर्ज कराई थी कि अज्ञात बदमाशों ने उनका अपहरण कर लिया है। चार दिनों तक लापता रहने के बाद जब वह मिलीं, तो उन्होंने पुलिस पर लापरवाही के आरोप लगाए और खुद को बंधक बनाए जाने की कहानी सुनाई। इस सूचना से पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया और आनन-फानन में धारा 140(3) BNS के तहत मुकदमा दर्ज हुआ।
2. 100 घंटे की जांच और डिजिटल साक्ष्यों का जाल
पुलिस अधीक्षक अपर्णा रजत कौशिक ने मामले की गंभीरता को देखते हुए थाना अदलहाट, SOG और सर्विलांस की संयुक्त टीम को लगाया। जांच के दौरान पुलिस को सरिता के बयानों में विरोधाभास मिला। जब डिजिटल फुटप्रिंट्स और मोबाइल लोकेशन की जांच की गई, तो परतें खुलनी शुरू हुईं:
लोकेशन: कथित अपहरण के दौरान पीड़िता की लोकेशन उन जगहों पर मिली जहाँ वह स्वेच्छा से गई थी।
सहयोगी की भूमिका: अमरदीप नामक व्यक्ति के साथ सरिता के निरंतर संपर्क और मोटरसाइकिल से आवाजाही के प्रमाण मिले।
3. पुलिस की थ्योरी: क्यों रची गई साजिश?
गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने दावा किया कि सरिता पटेल चुनार पुलिस द्वारा पूर्व में की गई कुछ कार्यवाहियों से नाराज थी। वह पुलिस पर दबाव बनाकर अपनी बात मनवाना चाहती थी और इस सनसनीखेज मामले के जरिए नाजायज धन उगाही की फिराक में थी।
4. ‘प्लान-बी’: रोंगटे खड़े कर देने वाला ड्रामा
पूछताछ में सामने आया कि घटना को असली दिखाने के लिए सरिता ने अमरदीप की मदद से अपने ही हाथ-पैर बंधवाए। हद तो तब हो गई जब मामले को और अधिक ‘खतरनाक’ दिखाने के लिए मोटरसाइकिल से पेट्रोल निकालकर शरीर पर छिड़कने की योजना बनाई गई, ताकि पुलिस बैकफुट पर आ जाए।
अदालती कार्यवाही और शाम को मिली ‘राहत’
कोर्ट में पुलिस की थ्योरी को लगा झटका, सभी आरोपी रिहा
विशेष घटनाक्रम:
जहाँ दोपहर तक पुलिस अपनी सफलता के गुणगान कर रही थी, वहीं शाम होते-होते अदालत के एक फैसले ने पूरे मामले की दिशा बदल दी।
न्यायालय में पेशी और गंभीर धाराएं,
पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ BNS की अत्यंत कठोर धाराएं (जैसे धारा 61(2) आपराधिक साजिश, 308(6) जबरन वसूली, 224 लोक सेवक को गुमराह करना आदि) लगाकर उन्हें न्यायालय में पेश किया। पुलिस का उद्देश्य आरोपियों को लंबी हिरासत में भेजना था।
अदालत की तीखी प्रतिक्रिया और फटकार,
सुनवाई के दौरान जब बचाव पक्ष के वकीलों ने पुलिस की थ्योरी को चुनौती दी, तो माननीय न्यायालय ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए।
अनावश्यक धाराएं: कोर्ट ने इस बात पर नाराजगी जताई कि बिना पर्याप्त साक्ष्यों के इतनी गंभीर धाराएं क्यों लगाई गईं।
पुलिस को चेतावनी: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल संदेह या दबाव बनाने के लिए किसी नागरिक की स्वतंत्रता का हनन नहीं किया जा सकता।
शाम का नाटकीय मोड़: सामूहिक जमानत,
न्यायालय ने मामले के तथ्यों को देखते हुए पुलिस के तर्कों को अपर्याप्त माना। शाम को कोर्ट ने एक ऐतिहासिक आदेश जारी करते हुए:
मुख्य अभियुक्ता सरिता सिंह पटेल सहित सहयोगी अमरदीप, विजय कुमार, सुभाष, अंकिता और सुनीता को तत्काल जमानत दे दी।
अदालत ने पुलिस को निर्देश दिया कि वे मामले की विवेचना में पारदर्शिता बरतें और किसी को अनावश्यक परेशान न करें।
वर्तमान स्थिति: साख का सवाल,
जमानत मिलने के बाद अब यह मामला मिर्जापुर में चर्चा का विषय बन गया है। एक तरफ जहाँ पुलिस इसे अपने ‘गुड वर्क’ के रूप में देख रही थी, वहीं कोर्ट की फटकार और तत्काल जमानत ने पुलिस की जांच की गुणवत्ता पर सवालिया निशान लगा दिया है।
यह मामला एक तरफ पत्रकारिता और सक्रियता की आड़ में रची गई कथित साजिश का उदाहरण है, तो दूसरी तरफ कानून की उन बारीकियों का भी, जहाँ अदालत ने पुलिस की “अति-सक्रियता” पर लगाम लगाई। फिलहाल सभी आरोपी जेल से बाहर हैं, लेकिन कानूनी लड़ाई अभी जारी रहेगी।
रिपोर्ट – विवेक कुमार यादव









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