भवन निर्माण के साथ भाव निर्माण भी आवश्यक: स्वामी शंकर विजयेन्द्र सरस्वती

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वाराणसी

बुद्ध पूर्णिमा के पावन अवसर पर काशी के अस्सी घाट स्थित श्री जगन्नाथ जी मंदिर के जीर्णोद्धार का संकल्प लेते हुए कांची कामकोटि पीठ के पूज्य शंकराचार्य स्वामी शंकर विजयेन्द्र सरस्वती ने हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में विधिवत शिलापूजन किया।यह ऐतिहासिक मंदिर दो शताब्दियों से अधिक पुरानी धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपरा का प्रतीक है। इसकी स्थापना सन् 1790 में पुरी के जगन्नाथ मंदिर के तत्कालीन मुख्य पुजारी पंडित स्वामी तेजनिधि ब्रह्मचारी द्वारा की गई थी। यहां भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्रा एवं अग्रज बलभद्र के विग्रह पारंपरिक विधि से पूजित होते आ रहे हैं।अपने संबोधन में शंकराचार्य जी ने कहा कि मन के विकास के लिए मंदिरों का विकास आवश्यक है।

उन्होंने संत, समाज और सरकार को मिलकर राष्ट्र निर्माण में योगदान देने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि मंदिर जीर्णोद्धार के लिए प्रतिनिधि के साथ-साथ निधि की भी आवश्यकता होती है। भवन निर्माण के साथ भाव निर्माण भी जरूरी है, जो मंदिर निर्माण से ही संभव है।उन्होंने यह भी कहा कि जैसे देश में नेशनल हाईवे बन रहे हैं, उसी तरह नेशनल हेरिटेज वे का भी निर्माण होना चाहिए।

साथ ही उन्होंने कानून के पालन के साथ धर्म के प्रति आस्था बनाए रखने पर बल दिया और कहा कि “तिरस्कार किसी का नहीं, पुरस्कार सबको” का भाव ही देश की एकता और अखंडता की आधारशिला है।कार्यक्रम की शुरुआत में मंदिर न्यास के सचिव शैलेश कुमार त्रिपाठी ने जीर्णोद्धार की विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि भगवान जगन्नाथ ने वर्तमान समय में इस कार्य के लिए हमें माध्यम बनाया है, जो हमारे लिए सौभाग्य की बात है।

मंदिर न्यास के अध्यक्ष बृजेश सिंह ने अतिथियों का स्वागत किया। कार्यक्रम में आए श्रद्धालुओं के लिए प्रसाद की व्यवस्था भी की गई।इस अवसर पर पद्मभूषण प्रो. वशिष्ठ त्रिपाठी, नेत्र चिकित्सक आर.के. ओझा, प्रख्यात सितार वादक देवव्रत मिश्र, कुटुंब प्रबोधन पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र प्रमुख डॉ. शुकदेव त्रिपाठी एवं डॉ. संतोष कुमार मिश्र सहित संगीत, साहित्य और कला जगत से जुड़े कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

“प्राणियों में सद्भावना हो और विश्व का कल्याण हो” के उद्घोष के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।

 

रिपोर्ट – जगदीश शुक्ला

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