अपील लंबित तो सजा सस्पेंड! सुप्रीम कोर्ट का सख्त संदेश—“सालों तक जेल रखना न्याय का मज़ाक”

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नई दिल्ली।

गंभीर अपराध में दोषसिद्धि के बावजूद यदि अपील वर्षों तक लंबित रहे तो दोषी को अनिश्चितकाल तक जेल में रखना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है—यह अहम टिप्पणी करते हुए Supreme Court of India ने ओडिशा हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया।

दो जजों की बेंच—जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एससी शर्मा—ने कहा कि भले ही मामला हत्या जैसा जघन्य अपराध का हो, लेकिन यदि सज़ा के खिलाफ अपील की सुनवाई में असामान्य देरी हो रही है, तो सज़ा सस्पेंड करने की मांग को ठुकराया नहीं जा सकता।

2016 से लंबित अपील, 11 साल से अधिक जेल

मामला ओडिशा के मुना बिसोई से जुड़ा है, जिन्हें सेशंस कोर्ट ने Indian Penal Code की धारा 302/34 (हत्या) और Arms Act की धारा 27 के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सज़ा सुनाई थी।

दोषी ने 2016 में Orissa High Court में अपील दायर की, लेकिन 2025 तक भी उस पर अंतिम सुनवाई नहीं हो सकी। हाईकोर्ट ने सज़ा पूरी तरह सस्पेंड करने से इनकार किया, हालांकि तीन महीने की अंतरिम जमानत दी थी।अंतरिम अवधि खत्म होने से पहले आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।

1977 के ऐतिहासिक फैसले का हवाला

सुप्रीम कोर्ट ने 1977 के चर्चित मामले Kashmira Singh v State of Punjab का उल्लेख करते हुए कहा कि अगर अपील वर्षों तक लंबित है, तो आरोपी को जेल में रखना “न्याय का मज़ाक” होगा।

कोर्ट ने दो टूक कहा था—

“क्या किसी व्यक्ति को पाँच–छह साल तक जेल में रखकर, बाद में निर्दोष पाए जाने पर उसकी खोई आज़ादी लौटाई जा सकती है? न्याय में देरी, न्याय से वंचित करने के reveals है।”

हाईकोर्ट का आदेश रद्द, सज़ा सस्पेंड

सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा हाईकोर्ट का आदेश निरस्त करते हुए आरोपी की उम्रकैद की सज़ा को अपील लंबित रहने तक सस्पेंड कर दिया और अंतरिम बेल को नियमित राहत में बदल दिया।

न्यायपालिका को संदेश

यह फैसला स्पष्ट करता है कि अपीलों के निस्तारण में देरी के कारण किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने संकेत दिया कि जब तक अपील पर समयबद्ध सुनवाई संभव न हो, तब तक सामान्यतः जमानत दी जानी चाहिए—जब तक कोई ठोस कारण न हो।

यह निर्णय न केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को मजबूती देता है, बल्कि न्यायिक व्यवस्था में जनता के विश्वास को भी बनाए रखने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।

 

रिपोर्ट विजयलक्ष्मी तिवारी

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