जौनपुर की झील पर बढ़ता कब्ज़ा: प्रशासन की चुप्पी से पनपता संकट

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जौनपुर,  शहर इस समय एक ऐसे सवाल के बीच खड़ा है। जिसका जवाब केवल प्रशासन ही नहीं बल्कि सरकार को भी देना होगा। वाजिदपुर तिराहा से जेसीज चौराहे तक फैली वह ऐतिहासिक झील, जो वर्षों से शहर और आसपास के दर्जनों गांवों के बरसाती पानी का प्राकृतिक निकास रही है। आज वही झील खुद अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है।

यह वही झील है। जिसके माध्यम से बरसात का पानी बहकर अंततः गोमती नदी में समाहित हो जाता है। कभी यह जलस्रोत शहर के पर्यावरण और जल निकासी व्यवस्था की जीवनरेखा हुआ करता था। सरकार ने इसके सुंदरीकरण की योजना बनाई, अतिक्रमण हटाने के लिए कई दर्जन मकानों को नोटिस भी जारी हुए। उम्मीद जगी कि झील का अस्तित्व बचेगा, शहर को जलभराव से राहत मिलेगी और पर्यावरण को नया जीवन मिलेगा।

लेकिन दुर्भाग्य यह है। कि न तो एक भी बड़ा अतिक्रमण टूटा, न ही झील का सुंदरीकरण हुआ।
आज हालात यह हैं। कि शहर के कथित बड़े भूमाफिया सुनियोजित तरीके से इस झील पर कब्जा जमाने में लगे हैं। पहले नगर पालिका की गाड़ियों से कूड़ा डलवाया जाता है। फिर धीरे-धीरे भूमि समतल की जाती है। और फिर उसी स्थान पर आलीशान इमारतें खड़ी हो जाती हैं। यह सब खुलेआम होता है। और सबसे चौंकाने वाली बात यह है। कि इसी मार्ग से जिले के आला अधिकारियों और क्षेत्र के प्रभावशाली नेताओं का काफिला रोज़ गुजरता है।

क्या किसी को यह दिखाई नहीं देता।
क्या झील केवल गरीबों के लिए ही कानून का विषय है।

जब कोई असहाय परिवार दो गज जमीन पर अपना आशियाना बनाता है। तो प्रशासन की आंखें तुरंत खुल जाती हैं। बुलडोज़र चल पड़ते हैं। लेकिन जब करोड़ों की इमारतें जलनिकासी की जीवनरेखा पर खड़ी हो जाती हैं। तो सब खामोश क्यों हो जाते हैं।

यह केवल अतिक्रमण का मामला नहीं है।
यह आने वाले समय में शहर को डूबाने की साज़िश है।
यह पर्यावरण के साथ विश्वासघात है।
यह प्रशासनिक संवेदनहीनता का आईना है

अगर समय रहते इस झील को अतिक्रमण से मुक्त नहीं कराया गया। तो आने वाले वर्षों में बरसात का पानी सड़कों, घरों और बाजारों में घुसेगा। तब जिम्मेदारी किसकी होगी।

आज आवश्यकता है।

झील की तत्काल पैमाइश और सीमांकन हो।
अवैध कब्जों की निष्पक्ष जांच हो।
भूमाफियाओं पर कठोर कानूनी कार्रवाई हो।
सुंदरीकरण योजना को समयबद्ध तरीके से लागू किया जाए।
जौनपुर की जनता जवाब चाहती है।
प्रशासन से भी, और सरकार से भी।
झील केवल पानी का स्रोत नहीं होती है।‌वह शहर की सांसें भी होती है।
अगर सांसें ही घुटने लगें, तो विकास के दावे खोखले साबित होते हैं।
अब देखना यह है। कि शासन-प्रशासन जागता है। या इतिहास एक और जलस्रोत के समाप्त होने का गवाह बनता है।

 

रिपोर्ट – सुरेश कुमार शर्मा

 

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