पत्रकारिता कटघरे में, खाकी पर सवाल बिना जांच आईटी एक्ट में मुकदमा—क्या मीडिया पर लगाम लगाने की तैयारी?

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उन्नाव

उन्नाव में खाकी के रवैये ने अभिव्यक्ति की आज़ादी और स्वतंत्र पत्रकारिता को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बिना प्राथमिक जांच, बिना तथ्यों के समुचित परीक्षण के, एक पत्रकार पर सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66E के तहत मुकदमा दर्ज कर दिया गया। यह कार्रवाई अब केवल एक कानूनी कदम नहीं, बल्कि मीडिया पर पाबंदी लगाने के पुलिसिया इरादे के रूप में देखी जा रही है।

मामला एक पुराने वीडियो से जुड़ा है, जो वर्ष 2019 की घटना का है और वर्षों से सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म पर मौजूद रहा है। वीडियो में एक राजनीतिक पहुंच वाली महिला द्वारा दबंगई करते हुए दूसरी महिला के साथ मारपीट और कपड़े उतारने का दृश्य दिखाई देता है। यह वीडियो फरवरी 2026 में एक डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म पर पत्रकारिता संदर्भ में साझा हुआ, वह भी नियमों के अनुरूप ब्लर करके।

ध्यान देने वाली बात यह है कि वीडियो पोस्ट होने के कुछ ही घंटों के भीतर संपादकीय स्तर पर त्रुटि सामने आने पर उसे तुरंत हटा दिया गया। न तो वीडियो नया था, न ही निजी रूप से चोरी-छिपे रिकॉर्ड किया गया। इसके बावजूद पुलिस ने बिना यह परखे कि वीडियो पहले से सार्वजनिक डोमेन में वर्षों से मौजूद था या नहीं, सीधे आपराधिक मुकदमा दर्ज कर लिया।

आईटी एक्ट की धारा 66E, जो निजता के उल्लंघन से जुड़ी है, सामान्यतः उन मामलों में लागू होती है जहां किसी की निजी या गोपनीय स्थिति को गैरकानूनी तरीके से रिकॉर्ड या प्रसारित किया गया हो। ऐसे में पहले से सार्वजनिक और वर्षों पुराने वीडियो पर इस धारा का प्रयोग कानून की मंशा पर ही सवाल खड़े करता है।

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि वीडियो में शामिल आरोपी की राजनीतिक पहुंच की चर्चा आम है। जानकारों का कहना है कि इसी दबाव में पुलिस ने निष्पक्ष जांच के बजाय आसान रास्ता चुना—सवाल पूछने वाले पर ही कार्रवाई। पुलिस के सोशल मीडिया हैंडल पर उठ रहे सवालों और जवाब मांगने की प्रवृत्ति से असहज होकर यह कदम उठाया गया, ऐसा भी कहा जा रहा है।

यह प्रकरण अब केवल एक एफआईआर तक सीमित नहीं रहा। इसे पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को डराने तथा संदेश देने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है कि यदि सत्ता या प्रभावशाली चेहरों से जुड़े मुद्दों को उठाया गया, तो नतीजे भुगतने पड़ सकते हैं।

मीडिया और लोकतंत्र पर नजर रखने वालों का मानना है कि यदि इस तरह बिना जांच पत्रकारों को कानूनी शिकंजे में कसने की परंपरा शुरू हुई, तो आने वाले समय में सच दिखाना सबसे बड़ा अपराध बन जाएगा। सवाल यह है—क्या उन्नाव में अब सच दिखाने की सज़ा तय होने लगी है?

यह सवाल केवल एक पत्रकार का नहीं, बल्कि पूरी स्वतंत्र पत्रकारिता और लोकतांत्रिक मूल्यों का है।

 

 

रिपोर्ट – जगदीश शुक्ला

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