5 दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सुभाष महोत्सव का शुभारम्भ

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वाराणसी, 21 जनवरी।   आजादी के महानायक नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के जन्मदिवस को ऐतिहासिक बनाने के उद्देश्य से विशाल भारत संस्थान द्वारा 5 दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सुभाष महोत्सव का आयोजन लमही स्थित सुभाष भवन में किया गया। अंतर्राष्ट्रीय सुभाष महोत्सव का उद्घाटन विश्व के जाने-माने पर्यावरणविद, नागालैंड अन्तर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के चांसलर प्रोफेसर प्रिय रंजन त्रिवेदी ने विश्व के पहले सुभाष मन्दिर में माल्यार्पण और आरती कर एवं नारियल अर्पित कर मशाल जलाकर किया।

जाने-माने शिक्षाविद प्रोफेसर त्रिवेदी जब सुभाष भवन पहुंचे तो उपस्थित युवाओं ने पुष्प वर्षा कर उनका स्वागत किया। सुभाष महोत्सव के उद्घाटन करते ही जय हिन्द, दिल्ली चलो और तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा के गगनभेदी नारे लगाए गए। पूरी दुनियां का पहला सुभाष मन्दिर काशी में स्थापित है, जहाँ प्रतिवर्ष सुभाषवादी दर्शन पूजन के लिए आते हैं।

इस अवसर पर आयोजित “सुभाष : खोज अभी शेष है” विषयक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन नेताजी सुभाष सभागार में किया गया, जिसमें इतिहासकारों, शोधकर्ताओं और सुभाषवादी विचारकों ने भाग लिया। भारत माता की प्रार्थना एवं दीपोज्वलन से मुख्य अतिथि एवं उद्घाटनकर्ता प्रोफेसर प्रिय रंजन त्रिवेदी ने संगोष्ठी का शुभारम्भ किया। बाल आजाद हिन्द बटालियन की सेनापति दक्षिता भारतवंशी के नेतृत्व में प्रोफेसर त्रिवेदी को सलामी दी गयी।

इस वर्ष का “नेताजी सुभाष चन्द्र बोस राष्ट्रीय पत्रकारिता पुरस्कार-2026” एवं 11 हजार रुपये का नगद पुरस्कार निशांत चतुर्वेदी को विशाल भारत संस्थान द्वारा प्रोफेसर त्रिवेदी ने प्रदान किया।

भारतीय संस्कृति, नेताजी सुभाष के विचारों पर शोध करने के लिए बीएचयू की इतिहास की छात्रा सृष्टि त्यागी को उनके शोध पत्र “सुभाष की खोज के लिए बने आयोग का झूठ और सच” के लिए प्रोफेसर प्रिय रंजन त्रिवेदी स्कालरशिप अवार्ड दिया गया। इस अवसर पर नागालैंड अन्तर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के चांसलर प्रोफ़ेसर त्रिवेदी को बनारस के बुनकरों द्वारा निर्मित दुपट्टा डॉ० कवीन्द्र नारायण, डॉ० अर्चना भारतवंशी, डॉ० मृदुला जायसवाल ने संयुक्त रूप से दिया।

मुख्य अतिथि प्रोफेसर प्रियरंजन त्रिवेदी ने कहा कि सुभाष कोई व्यक्ति नहीं, एक विचारधारा और आंदोलन थे। उनसे प्रेरित होकर हजारों युवाओ ने देश के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। सुभाष के न होने की कमी इतिहास को हमेशा खलती रहेगी। सुभाष की बात मानी गयी होती, तो देश विभाजित नहीं होता। यह अवधारणा प्रत्येक भारतीय के दिलो दिमाग में है। सुभाष का रहस्य तब तक नहीं सुलझ सकता, जब तक सभी अभिलेख पूर्ण रूप से सार्वजनिक नहीं किये जाते और निष्पक्ष, पारदर्शी शोध को प्रोत्साहन नहीं मिलता, तब तक यह प्रश्न इतिहास और राष्ट्र दोनों के सामने बना रहेगा।

प्रोफेसर त्रिवेदी ने कहा कि सुभाष खोज अभी शेष है, हाँ खोज अभी शेष है। इतिहास में भी, विचार में भी और हमारे कर्तव्यों में भी। जब तक भारत अपने आदर्शों को पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं कर लेता, जब तक साहस, त्याग और अनुशासन हमारे जीवन का आधार नहीं बन जाते, तब तक सुभाष की खोज चलती रहेगी।

इतिहासकार एवं काशी विद्यापीठ के इतिहास विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रोफेसर अशोक कुमार सिंह ने कहा कि जितना सुभाष के इतिहास के साथ छेड़छाड़ हुई है शायद ही दुनिया के किसी नायक के साथ हुई हो। सुभाष की खोज के लिए आयोग नहीं, वैश्विक स्तर पर अभियान चलाना होगा और दुनियां की सरकारों से मदद लेनी होगी।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की पूर्व संकाय अध्यक्ष व इतिहास विभाग में प्रोफेसर बिंदा परांजपे ने अपने उद्बोधन में आजादी के संघर्ष में महिलाओं की भूमिका पर एवं भारत के बाहर से भारत को समझना चाहिए इस बात की ओर सबका ध्यान केंद्रित करने का प्रयास किया।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के प्रोफेसर प्रवेश भारद्वाज ने अपने उद्बोधन में परम पावन नेताजी सुभाष चंद्र बोस के लिए कहा कि वह अतुलनीय हैं। उनकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती। उन्होंने नेताजी के आध्यात्मिक जीवन पर प्रकाश डाला। उन्होंने विभिन्न स्रोतों के माध्यम से इस बात की पुष्टि की नेताजी आध्यात्मिक व राष्ट्रीय चिंतन साथ-साथ करते थे।

विशाल भारत संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ० राजीव श्रीगुरुजी ने कहा कि आजाद हिन्द सरकार को जब 10 देशों ने मान्यता दे दी थी, तब प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में नेताजी के नाम इतिहास में दर्ज क्यों नहीं हो पाया। इतिहास क्यों वैसा ही लिखा जाता रहा जैसा अंग्रेज चाहते थे। नेताजी का सम्बन्ध नार्थ ईस्ट से रहा है। नागालैंड अन्तर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के चांसलर प्रोफेसर प्रियरंजन त्रिवेदी से नेताजी सुभाष चेयर स्थापित करने की मांग करता हूँ।

द्वितीय सत्र में जीनत रहमान, सृष्टि त्यागी, रोकसार परवीन, चन्द्रवीर ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किये। गोपाल कृष्ण श्रीवास्तव द्वारा लिखित पुस्तक “जी०के० की कहानियाँ” का विमोचन अतिथियों द्वारा किया गया।

संचालन डॉ० निरंजन श्रीवास्तव ने किया एवं धन्यवाद डॉ० मृदुला जायसवाल ने दिया। इस अवसर पर अभिराम दास जी महाराज, डॉ० कवीन्द्र नारायण, ज्ञान प्रकाश, डॉ० अर्चना भारतवंशी, डॉ० नजमा परवीन, नाजनीन अंसारी, अनिल पाण्डेय, गुलाब श्रीवास्तव, शिवेंद्र सिन्हा, हरिशंकर सिन्हा, दिलीप सिंह, अजीत सिंह टीका, नौशाद अहमद दुबे, शिवशरण सिंह, सौरभ पाण्डेय, सत्यम राय, सत्यम सिंह, डॉ० भोलाशंकर गुप्ता, डॉ० तपन घोष, डॉ० ए०पी० सिंह, मयंक श्रीवास्तव, डॉ० धनंजय यादव, डॉ० अंजली यादव, डॉ० लक्ष्मी, दीपक, विवेकानंद सिंह, नीलमणि सिंह आदि लोग मौजूद रहे।

 

रिपोर्ट विजयलक्ष्मी तिवारी

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