बीजेपी ने जिलाध्यक्षों की सूची जारी की, लेकिन हैरानी की बात यह है कि मोदी जी की कर्मभूमि बनारस का जिलाध्यक्ष अभी तक घोषित नहीं हुआ। ऐसा लग रहा है जैसे बनारस में बीजेपी को कोई ऐसा काबिल चेहरा मिल ही नहीं रहा, जिसे जिलाध्यक्ष बनाया जा सके जबकि महानगर अध्यक्ष की घोषणा हुए भी महीनों बीत चुके हैं।
महानगर में भी नए चेहरे की जगह पूर्व अध्यक्ष प्रदीप अग्रहरि को ही फिर से कमान दे दी गई। सोचने वाली बात है कि केंद्र में तीसरी और यूपी में दूसरी पारी खेल रही बीजेपी अगर बनारस में जिलाध्यक्ष के लिए एक भी सक्षम कार्यकर्ता नहीं खोज पा रही, तो यह स्थिति संगठन को भीतर से खोखला बताने जैसी है।
एक व्यक्ति–एक पद का नारा देने वाली बीजेपी ने हंसराज विश्वकर्मा को एमएलसी बनाने के बावजूद जिलाध्यक्ष पद भी उन्हीं के हाथ में रहने दिया। जबकि संगठन में यह परंपरा कभी नहीं रही कि कोई एक व्यक्ति वर्षों तक लगातार एक ही पद पर जमे रहे।
अगर लगातार एमएलसी बनाए जाने के बाद भी जिलाध्यक्ष वही बने हैं, तो क्या यह मान लिया जाए कि बनारस बीजेपी में अब हंसराज विश्वकर्मा का कोई विकल्प ही नहीं बचा
क्या संगठन अब उनके रहमोकरम पर चल रहा है ,यहां सांगठनिक तौर पर लाचार है।
एक व्यक्ति दो पद वह भी लंबे समय से ऐसा फैसला कहीं न कहीं अन्य कार्यकर्ताओं के साथ नाइंसाफी भी लगता है। ओबीसी कोटे से लगातार जिलाध्यक्ष बने हंसराज की जगह इस बार सामान्य वर्ग से किसी अन्य चेहरे को मौका देना चाहिए वरना अंदरूनी असंतोष और असंतुलन बढ़ना स्वाभाविक है।
हालांकि इतना तो तय है की बीजेपी को बनारस में हंसराज विश्वकर्मा से काबिल कोई दूसरा कार्यकर्ता नहीं मिल रहा, तो इसका यह मतलब भी है कि उनका कद संगठन के भीतर काफी ऊंचा हो चुका है। वह बनारस में संगठन के दूसरे मोदी बन चुके हैं।
रही बाकी कार्यकर्ताओं की बात तो अब उन्हें डंडा-झंडा ढोने रैलियों में भीड़ जुटाने के साथ हंसराज की बराबरी की काबिलियत खुद में विकसित करें। क्योंकि बनारस में बीजेपी हंसराज विश्वकर्मा के आगे विकल्पहीन है।











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